भीष्मकृतः पाण्डवपक्ष-महारथ-प्रशंसा
Bhishma’s appraisal of Pandava-aligned chariot-warriors
कुरूणामहितो नित्य न च राजावबुध्यते । को हि नाम समानेषु राजसूदारकर्मसु,“तुम कौरवोंका सदा अहित करते हो; परंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझते हैं। तुम मेरे गुणोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण जिस प्रकार राजाओंकी मुझपर विरक्ति कराना चाहते हो, वैसा प्रयत्न तुम्हारे सिवा दूसरा कौन कर सकता है? इस समय युद्धका अवसर उपस्थित है और समान श्रेणीके उदारचरित राजा एकत्र हुए हैं; ऐसे अवसरपर आपसमें भेद (फूट) उत्पन्न करनेकी इच्छा रखकर कौन पुरुष अपने ही पक्षके योद्धाका इस प्रकार तेज और उत्साह नष्ट करेगा?
kurūṇām ahito nityaṁ na ca rājāvabudhyate | ko hi nāma samāneṣu rājasūdārakarmasu ||
ভীষ্মে ক’লে—তুমি কৌৰৱসকলৰ সদায় অকল্যাণ কৰিছা, তথাপি ৰজাই সেয়া বুজি নাপায়। যুদ্ধৰ সময় উপস্থিত, সমমৰ্যাদাৰ উদাৰচৰিত ৰজাসকল একত্ৰ হৈছে; এনে সময়ত বিভেদ ঘটাবলৈ চাই নিজৰ পক্ষৰ যোদ্ধাৰ তেজ আৰু উদ্যম কোনে নষ্ট কৰিব?
भीष्म उवाच