Adhyāya 160: Arjuna’s Envoy-Message—Critique of Borrowed Valor and Pre-dawn Mobilization
एवमेतत् सदा दण्डं क्षत्रिया: क्षत्रिये दधु: । वेणीं कृत्वा षण्ढवेष: कन्यां नर्तितवानसि,“इसी प्रकार सदासे ही क्षत्रियोंने अपने विरोधी क्षत्रियको दण्ड दिया है। इसीलिये तुम्हें भी सिरपर वेणी रखाकर और हिजड़ोंका वेष बनाकर राजा विराटकी कन्याको नचानेका काम करना पड़ा
এইদৰে চিৰকাল ক্ষত্ৰিয়সকলে ক্ষত্ৰিয়ক দণ্ড দিছে। সেইবাবেই তুমি বেণী বাঁধি, ষণ্ডবেশ ধৰি, ৰজা বিরাটৰ কন্যাক নচাইছিলা।
उलूक उवाच