Ulūka’s Provocation and Keśava’s Counter-Message (उलूकदूत्ये केशवप्रत्युत्तरम्)
दर्शयेम च रूपाणि स्वशरीरे बहुन्यपि । न तु पर्यायतः सिद्धिर्बुद्धिमाप्रोति मानुषीम्,“इतना ही नहीं, हम अपने शरीरमें बहुत-से रूप भी प्रकट करके दिखा सकते हैं; परंतु इन सब प्रदर्शनोंसे न तो अपने अभीष्टकी सिद्धि होती है और न अपना शत्रु ही मानवीय बुद्धि अर्थात् भयको प्राप्त हो सकता है
darśayema ca rūpāṇi svaśarīre bahūny api | na tu paryāyataḥ siddhir buddhim āpnoti mānuṣīm ||
ইয়াতকৈও অধিক, আমি নিজৰ দেহতেই বহু ৰূপ প্ৰকাশ কৰি দেখুৱাব পাৰোঁ; কিন্তু এনে ক্ৰমাগত প্ৰদৰ্শনে না অভীষ্ট সিদ্ধ হয়, না শত্রুৰ মনত মানৱীয় বুদ্ধি—অৰ্থাৎ ভয়—জাগে।
संजय उवाच