Nahūṣa’s Pride, the Ṛṣi-Borne Palanquin, and the Search for Indra (नहुष-इन्द्राणी-प्रकरणम्)
गुहां चैतत् त्वया कार्य नाख्यातव्यं शुभे क्वचित् | गत्वा नहुषमेकान्ते ब्रवीहि च सुमध्यमे,'शुभे! तुम्हें गुप्तरूपसे यह कार्य करना है। कहीं (भी इसे) प्रकट न करना। सुमध्यमे! तुम एकान्तमें नहुषके पास जाकर कहो--जगत्पते! आप दिव्य ऋषियानपर बैठकर मेरे पास आइये। ऐसा होनेपर मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी”
guhāṁ caitat tvayā kāryaṁ nākhyātavyaṁ śubhe kvacit | gatvā nahuṣam ekānte brūhi ca sumadhyame |
“শুভে! এই কাম তোমাক গোপনে কৰিব লাগিব; ক’তো ইয়াক প্ৰকাশ নকৰিবা। হে সুমধ্যমে! একান্তে নহুষৰ ওচৰলৈ গৈ এই বাৰ্তা কোৱা।”
शल्य उवाच