Udyoga-parva Adhyāya 123 — Bhīṣma–Droṇa–Vidura Upadeśa to Duryodhana
Keśava-vākya aftermath
अनुनेतुं महाबाहो यतस्व पुरुषोत्तम । “तात जनार्दन! मैं अपने वशमें नहीं हूँ। जो कुछ किया जा रहा है, वह मुझे प्रिय नहीं है। किंतु क्या कहाँ? मेरे दुरात्मा पुत्र मेरी बात नहीं मानेंगे। प्रिय श्रीकृष्ण! महाबाहु पुरुषोत्तम! शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले मेरे इस मूर्ख पुत्र दुर्योधनको आप ही समझा-बुझाकर राहपर लानेका प्रयत्न कीजिये,इन्द्रियै: प्राकृतो लोभाद् धर्म विप्रजहाति यः । कामार्थावनुपायेन लिप्समानो विनश्यति
anu netuṁ mahābāho yatasva puruṣottama | indriyaiḥ prākṛto lobhād dharmaṁ viprajahāti yaḥ | kāmārthāv anupāyena lipsamāno vinaśyati ||
হে মহাবাহু পুৰুষোত্তম! তাক বুজাই সৎপথলৈ আনিবলৈ চেষ্টা কৰা। কিয়নো যি মানুহ ইন্দ্ৰিয়ৰ বশত পৰি নীচ লোভত ধৰ্ম ত্যাগ কৰে, সি অনুচিত উপায়ে কাম আৰু অৰ্থ লাভৰ লালসাত পৰি শেষত বিনষ্ট হয়।
वैशम्पायन उवाच