अध्याय १२२ — कृष्णस्य दुर्योधनं प्रति नीत्युपदेशः
Kṛṣṇa’s Ethical Counsel to Duryodhana
तदनेनैव दोषेण क्षीणं येनासि पातित: । अभिमानेन राजेन्द्र धिक्कृत: स्वर्गवासिभि:,ब्रह्माजी बोले--राजेन्द्र! तुमने कई हजार वर्षोतक अनेकानेक यज्ञों और दानोंके द्वारा जिस पुण्यफलका उपार्जन किया और प्रजापालनरूपी धर्मके द्वारा जिसे उत्तरोत्तर बढ़ाया, वह सब इस अभिमानरूपी दोषके कारण ही नष्ट हो गया था, जिससे तुम नीचे गिराये गये। तुम्हारे अभिमानके ही कारण स्वर्गलोकके निवासियोंने तुम्हें धिक््कार दिया था
tadanenaiva doṣeṇa kṣīṇaṁ yenāsi pātitaḥ | abhimānena rājendra dhikkṛtaḥ svargavāsibhiḥ ||
সেই একে দোষতেই সেই পুণ্য ক্ষয় হ’ল, আৰু সেই দোষতেই তুমি পতিত হ’লা। হে ৰাজেন্দ্ৰ! অহংকাৰৰ কাৰণেই স্বৰ্গবাসীয়ে তোমাক ধিক্কাৰ কৰিলে।
पितामह् उवाच