नारदकथितं माधव्याः तपश्चर्या–ययातेः स्वर्गविचारः | Nārada on Mādhavī’s Asceticism and the Scrutiny of Yayāti in Heaven
अपराण्यपि चत्वारि शतानि द्विजसत्तम | नीयमानानि संतारे हृतान्यासन् वितस्तया,'द्विजश्रेष्ठ! मार्गमें एक जगह नदीको पार करना पड़ा। इन छ: सौ घोड़ोंके साथ चार सौ और थे। नदी पार करनेके लिये ले जाये जाते समय वे चार सौ घोड़े वितस्ता (झेलम)- की प्रखर धारामें बह गये
aparāṇy api catvāri śatāni dvijasattama | nīyamānāni saṃtāre hṛtāny āsan vitastayā ||
নাৰদে ক’লে—হে দ্বিজশ্ৰেষ্ঠ! পথত এক ঠাইত নদী পাৰ হ’বলগীয়া হৈছিল। সেই ছয়শ’ৰ লগতে আৰু চাৰিশ’ অশ্ব আছিল; পাৰ কৰোঁতে বিতস্তাৰ প্ৰচণ্ড সোঁতে সেই চাৰিশ’ অশ্ব ভাহি গ’ল।
नारद उवाच