
स्वर्गारोहणपर्व — तृतीयोऽध्यायः (Indra and Dharma’s Consolation; Celestial Gaṅgā Purification)
Upa-parva: Svargārohaṇa (Divine Consolation and Purification Episode)
Vaiśaṃpāyana reports that after Yudhiṣṭhira stands briefly in the prior grim setting, the devas arrive led by Śakra (Indra), alongside Maruts, Vasus, Aśvins, Rudras, Ādityas, Siddhas, and great ṛṣis. With their luminous presence, the infernal markers—Vaitaraṇī, Kūṭaśālmalī, iron cauldrons, and other punitive visions—cease to appear, and an auspicious, fragrant, cooling wind arises. Indra addresses Yudhiṣṭhira with reassurance: the gods are pleased; his success is secured; and the experience of naraka is described as a necessary sight for kings, interpreted through a doctrine of karmic sequencing (some enjoy merit first then suffer, others suffer first then enjoy). Indra further explains that Yudhiṣṭhira’s brief ordeal corresponds to a residual ethical blemish linked to a ‘vyāja’ (pretext/deception) involving Droṇa, and that similar ‘by pretext’ descents applied to his companions. He is invited to behold his allies and even Karṇa established in their proper stations, and to relinquish grief. Dharma then appears in embodied form, explicitly praising Yudhiṣṭhira’s devotion, truthfulness, forbearance, and self-restraint, stating that this is the third and final test, and clarifying that the earlier perception of the brothers’ suffering was a divinely arranged māyā. Indra and Dharma guide him to the celestial Gaṅgā (Ākāśa-Gaṅgā); upon immersion, Yudhiṣṭhira’s human condition falls away, he attains a divine body, becomes free of enmity and distress, and proceeds surrounded by devas and praised by sages.
Chapter Arc: नरक-दर्शन के धुएँ और भय के बीच युधिष्ठिर को अचानक दिव्य प्रकाश का स्पर्श मिलता है—देवगण आते हैं और तमस छँटने लगता है। → युधिष्ठिर के चारों ओर दिखते विकृत शरीर और पीड़ा के दृश्य एक-एक कर अदृश्य होते हैं; तभी साक्षात् धर्म देह धारण कर उपस्थित होते हैं और इस विचित्र अनुभव का अर्थ खोलने लगते हैं—कर्मफल की दो राशियाँ, शुभ-अशुभ, और उनका क्रम। → धर्म युधिष्ठिर को कर्मफल-क्रम का रहस्य सुनाते हैं: कोई पहले नरक भोगकर फिर स्वर्ग पाता है, और कोई पहले स्वर्ग भोगकर फिर नरक—यह क्रम शेष बचे पुण्य-पाप के ‘भोग’ से तय होता है; साथ ही वे बताते हैं कि यह नरक-दर्शन ‘व्याज’ (उपाय/छल) से कराया गया था। → धर्म स्पष्ट करते हैं कि यह परीक्षा और दर्शन युधिष्ठिर के कल्याण हेतु था; फिर वे युधिष्ठिर को दिखाते हैं कि युद्ध में मारे गए अनेक राजा और योद्धा पापमुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त हो चुके हैं। अंततः युधिष्ठिर की सिद्धि और अक्षय लोकों की प्राप्ति की घोषणा होती है। → धर्म यह भी खोलते हैं कि द्रौपदी और पाण्डव भ्राताओं को भी इसी प्रकार ‘व्याज’ से नरक-दर्शन कराया गया—पाठक के मन में प्रश्न उठता है कि उनके सूक्ष्म दोष क्या थे और स्वर्गारोहण का अंतिम दृश्य कैसे पूर्ण होगा।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत स्वगरिह्हणपर्वमें युधिष्टिरकों नरकका दर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥/ २ ॥ ऑपन-माज बछ। अल तृतीयो<थध्याय: इन्द्र और धर्मका युधिष्िरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना वैशम्पायन उवाच स्थिते मुहूर्त पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजम्मुस्तत्र कौरव्य देवा: शक्रपुरोगमा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको उस स्थानपर खड़े हुए अभी दो ही घड़ी बीतने पायी थी कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता वहाँ आ पहुँचे
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে কৌৰৱবংশীয় জনমেজয়! ধৰ্মৰাজ যুধিষ্ঠিৰ তাত অল্প সময়হে থিয় হৈ আছিল; তেতিয়াই শক্ৰ (ইন্দ্ৰ)ৰ আগভাগে সকলো দেৱতা সেই ঠাইত উপস্থিত হ’ল।
Verse 2
सच विग्रहवान् धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम् तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिषिर:,साक्षात् धर्म भी शरीर धारण करके राजासे मिलनेके लिये उस स्थानपर आये जहाँ वे कुरुराज युधिष्छिर विद्यमान थे
আৰু স্বয়ং ধৰ্মও দেহধাৰণ কৰি ৰজাক প্ৰত্যক্ষভাৱে চাবলৈ আৰু পৰীক্ষা কৰিবলৈ সেই ঠাইলৈ আহিল, য’ত কুৰুৰাজ যুধিষ্ঠিৰ উপস্থিত আছিল।
Verse 3
तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु । समागतेषु देवेषु व्यगमत् तत् तमो नृूप,राजन्! जिनके कुल और कर्म पवित्र हैं, उन तेजस्वी शरीरवाले देवताओंके आते ही वहाँका सारा अन्धकार दूर हो गया इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरतनुत्यागे तृतीयो5ध्याय:
ৰাজন! যাঁহাদের কুল আৰু কৰ্ম পবিত্ৰ, সেই তেজস্বী দেহধাৰী দেৱতাসকল আহি উপস্থিত হোৱামাত্ৰে তাত থকা সকলো অন্ধকাৰ দূৰ হৈ গ'ল।
Verse 4
नादृश्यन्त च तास्तत्र यातना: पापकर्मिणाम् | नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह
তাত পাপকর্মীসকলৰ বাবে নিৰ্ধাৰিত যাতনাসমূহ দেখা নগ'ল—না বৈতৰণী নদী, না কূট-শাল্মলী (কাঁটাযুক্ত ভয়ংকৰ শাল্মলী গছ)।
Verse 5
विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्तत:,ववौ देवसमीपस्थ: शीतलो5तीव भारत | कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी
হে ভাৰত! তাত চাৰিওফালে দেখা বিকৃত দেহসমূহ সকলো অদৃশ্য হৈ গ'ল। তাৰ পিছত পবিত্ৰ সুগন্ধ বহন কৰা সুখদায়িনী শুচি বায়ু ব'বলৈ ধৰিলে; দেৱতাসকলৰ ওচৰত বোৱা সেই বায়ু অত্যন্ত শীতল যেন লাগিছিল।
Verse 6
ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन् । ततो वायु: सुखस्पर्श: पुण्यगन्धवह: शुचि:
কৌৰৱ-ৰাজাই সেই আশ্চৰ্য লক্ষণসমূহ দেখিলে; যি অদৃশ্য আছিল, সেয়াও প্ৰকাশ পালে। তেতিয়া সুখস্পৰ্শযুক্ত, পুণ্যসুগন্ধ বহন কৰা শুচি বায়ু ব'বলৈ ধৰিলে।
Verse 7
मरुत: सह शक्रेण वसवश्चाश्चिनौ सह
শক্র (ইন্দ্ৰ)-ৰ সৈতে মৰুতগণ, বসুগণ আৰু দুয়ো অশ্বিনীকুমাৰো (তাত উপস্থিত আছিল)।
Verse 8
साध्या रुद्रास्तथा55दित्या ये चान्येडपि दिवौकस: । सर्वे तत्र समाजग्मु: सिद्धाश्व॒ परमर्षय:
বৈশম্পায়নে ক’লে—সাধ্য, ৰুদ্ৰ, আদিত্য আৰু আন আন সকলো দিবৌকস তাত সমবেত হ’ল; সিদ্ধসকল আৰু পৰম ঋষিসকলেও তাত উপস্থিত হ’ল। ধৰ্ম আৰু আত্মসিদ্ধিৰ পৰিণতিৰ সেই মহাক্ষণত সৰ্বোচ্চ সত্তাসকল সাক্ষী হ’বলৈ একেলগে গোট খাইছিল।
Verse 9
यत्र राजा महातेजा थधर्मपुत्र: स्थितो5भवत् । इन्द्रके साथ मरुद्गण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अन्यान्य देवलोकवासी सिद्ध और महर्षि सभी उस स्थानपर आये जहाँ महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े थे ।। ततः शक्र: सुरपति: श्रिया परमया युत:
য’ত মহাতেজস্বী ধৰ্মপুত্ৰ ৰজা যুধিষ্ঠিৰ থিয় হৈ আছিল, তাতেই ইন্দ্ৰ মৰুদ্গণ আৰু বসুগণসহ, দুয়ো অশ্বিনীকুমাৰ, সাধ্যগণ, ৰুদ্ৰগণ, আদিত্যগণ আৰু আন আন দেবলোকবাসী, সিদ্ধ আৰু মহর্ষিসকল—সকলো আহি সমবেত হ’ল। তাৰ পাছত পৰম শ্ৰীৰে বিভূষিত দেৱপতি শক্ৰ প্ৰত্যক্ষ হ’ল।
Verse 10
युधिष्ठिर महाबाहो लोकाश्षाप्यक्षयास्तव,“महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে মহাবাহু যুধিষ্ঠিৰ! অক্ষয় লোক তোমাৰ বাবে নিশ্চিত। হে পুৰুষসিংহ, হে প্ৰভু! যি হৈ গ’ল, সি হৈ গ’ল। এতিয়া আৰু অধিক দুখ সহিবলগীয়া নাই। আহা, আমাৰ সৈতে চলা। হে মহাবাহো! তুমি মহাসিদ্ধি লাভ কৰিছা; লগতে অক্ষয় লোকসমূহো প্ৰাপ্ত হৈছে।
Verse 11
“महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে মহাবাহু যুধিষ্ঠিৰ! তুমি অক্ষয় লোক লাভ কৰিছা। হে পুৰুষসিংহ, হে প্ৰভু! এতিয়ালৈ যি ঘটিল, সি ঘটিল। এতিয়া আৰু দুখ সহিবলগীয়া নাই। আহা, আমাৰ সৈতে চলা। হে মহাবাহো! তুমি মহাসিদ্ধি লাভ কৰিছা; লগতে নিত্য লোকসমূহো প্ৰাপ্ত হৈছে।
Verse 12
न च मन्युस्त्वया कार्य: शृणु चेद॑ वचो मम | अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्य: सर्वराजभि:,“तात! तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है इसके लिये क्रोध न करना। मेरी यह बात सुनो! समस्त राजाओंको निश्चय ही नरक देखना पड़ता है
বৈশম্পায়নে ক’লে—ইয়াৰ বাবে তুমি ক্ৰোধ নকৰিবা; মোৰ কথা শুনা। হে তাত! সকলো ৰজাই অৱশ্যম্ভাৱীভাৱে নৰক দৰ্শন কৰিবলগীয়া হয়।
Verse 13
शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्व सुकृतं भुड्चक्ते पश्चान्रिरयमेव स:,'पुरुषप्रवर! मनुष्यके जीवनमें शुभ और अशुभ कर्मोंकी दो राशियाँ सज्चित होती हैं। जो पहले ही शुभ कर्म भोग लेता है उसे पीछे नरकमें ही जाना पड़ता है
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ! মানুহৰ জীৱনত শুভ আৰু অশুভ কৰ্মৰ দুটা সঞ্চিত ৰাশি থাকে। যিয়ে আগতেই নিজৰ পুণ্যফল ভোগ কৰি শেষ কৰে, সিয়ে পাছত অৱশিষ্ট পাপভোগৰ বাবে নৰকলৈ যাবই লাগে।
Verse 14
पूर्व नरकभाग् यस्तु पश्चात् स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्व स्वर्गमश्षुते,'परंतु जो पहले नरक भोग लेता है वह पीछे स्वर्गमें जाता है। जिसके पास पापकर्मोका संग्रह अधिक है वह पहले ही स्वर्ग भोग लेता है
বৈশম্পায়নে ক’লে— যিয়ে আগতে নৰকৰ ভাগ ভোগ কৰে, সিয়ে পাছত স্বৰ্গ লাভ কৰে। কিন্তু যাৰ পাপকর্মৰ সঞ্চয় অধিক, সিয়ে আগতে স্বৰ্গসুখ ভোগ কৰে আৰু পাছত দুঃখদ ফল ভোগ কৰে।
Verse 15
तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोडर्थिना नूप । व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्ण: सुतं प्रति
সেইবাবে, হে নৃপ! তোমাৰ সত্য শ্ৰেয় কামনা কৰি মই তোমাক এইদৰে আগবঢ়াই নিলোঁ। কিয়নো তোমাৰ দ্বাৰাই এক ব্যাজে দ্ৰোণক নিজৰ পুত্ৰৰ প্ৰতি বিশেষ অনুৰাগেৰে আচৰণ কৰিবলৈ প্ৰবৃত্ত কৰা হৈছিল।
Verse 16
यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा
তুমি যেনেকুৱা, ভীমো তেনেকুৱাই; পাৰ্থো তেনেকুৱাই; আৰু যমজ দুয়োজনো তেনেকুৱাই।
Verse 17
आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात्,'पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो
আহা, হে নৰশাৰ্দূল! তেওঁলোক সকলোৱে কল্মষৰ পৰা মুক্ত হৈছে।
Verse 18
स्वपक्ष्याश्वैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे । सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान् पश्य भरतर्षभ,'पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो
পুৰুষসিংহ! আহা—তেওঁলোক সকলোৱে পাপমুক্ত হৈছে। ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! তোমাৰ পক্ষৰ যি-যি ৰজা ৰণত নিহতা হৈছিল, তেওঁলোক সকলোৱে স্বৰ্গলোক প্ৰাপ্ত কৰিছে; আহা, তেওঁলোকৰ দৰ্শন কৰা।
Verse 19
कर्णश्रैव महेष्वास: सर्वशस्त्रभृतां वर: । स गत: परमां सिद्धि यदर्थ परितप्यसे,“तुम जिनके लिये सदा संतप्त रहते हो वे सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण भी परम सिकद्धिको प्राप्त हुए हैं
আৰু কৰ্ণো—সেই মহাধনুৰ্ধৰ, সকলো অস্ত্ৰধাৰীৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ—পৰম সিদ্ধি লাভ কৰিছে; যাৰ বাবে তুমি সদায় দুখত দগ্ধ হও।
Verse 20
त॑ पश्य पुरुषव्याप्रमादित्यतनयं विभो । स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ,'प्रभो! नरश्रेष्ठ! महाबाहो! तुम पुरुषसिंह सूर्यकुमार कर्णका दर्शन करो। वे अपने स्थानमें स्थित हैं। तुम उनके लिये शोक त्याग दो
হে প্ৰভু! নৰশ্ৰেষ্ঠ! মহাবাহো! সূৰ্যপুত্ৰ, পুৰুষসিংহ কৰ্ণক চোৱা—তেওঁ নিজৰ স্থানত প্ৰতিষ্ঠিত; সেয়ে তেওঁৰ বাবে শোক ত্যাগ কৰা।
Verse 21
भ्रातृश्चान्यांस्तथा पश्य स्वपक्ष्याश्रैव पार्थिवान् । स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्तान् व्येतु ते मानसो ज्वर:,“अपने दूसरे भाइयोंको तथा पाण्डवपक्षके अन्यान्य राजाओंको भी देखो। वे सब अपने-अपने योग्य स्थानको प्राप्त हुए हैं। उन सबकी सद्गतिके विषयमें अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये
তোমাৰ অন্য ভাতৃসকলকো চোৱা, আৰু তোমাৰ পক্ষৰ অন্য ৰজাসকলকো। তেওঁলোক সকলোৱে নিজৰ নিজৰ স্থান প্ৰাপ্ত কৰিছে; এতিয়া তোমাৰ মনৰ জ্বৰ—চিন্তা—দূৰ হওক।
Verse 22
कृच्छू पूर्व चानुभूय इत:प्रभूति कौरव । विहरस्व मया साथे गतशोको निरामय:,“कुरुनन्दन! पहले कष्टका अनुभव करके अबसे तुम मेरे साथ रहकर रोग-शोकसे रहित हो स्वच्छन्द विहार करो
হে কৌৰৱ! আগতে কষ্ট ভোগ কৰি, এতিয়াৰ পৰা মোৰ সৈতে থাকি—শোকমুক্ত, নিৰাময় হৈ—স্বচ্ছন্দে বিচৰণ কৰা।
Verse 23
कर्मणां तात पुण्यानां जितानां तपसा स्वयम् । दानानां च महाबाहो फल प्राप्रुहि पार्थिव,“तात! महाबाहु! पृथ्वीनाथ! अपने किये हुए पुण्यकर्मोंका, तपस्यासे जीते हुए लोकोंका और दानींका फल भोगो
বৈশম্পায়নে ক’লে— বৎস! মহাবাহু পৃথিৱীনাথ! এতিয়া তোমাৰ নিজ পুণ্যকৰ্মৰ ফল, তপস্যাৰে জয় কৰা লোকসমূহ, আৰু দানৰ প্ৰতিফল—এই সকলো গ্ৰহণ কৰি ভোগ কৰা।
Verse 24
अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्षाप्सरसो दिवि | उपसेवन्तु कल्याण्यो विरजो<म्बरभूषणा:,“आजसे देव, गन्धर्व तथा कल्याणस्वरूपा दिव्य अप्सराएँ स्वच्छ वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो स्वर्गलोकमें तुम्हारी सेवा करें
বৈশম্পায়নে ক’লে— আজিৰ পৰা স্বৰ্গত দেৱগণ, গন্ধৰ্বগণ আৰু মঙ্গলময় দিৱ্য অপ্সৰাসকল—নির্মল বস্ত্ৰ-অলংকাৰৰে ভূষিত হৈ—তোমাৰ সেৱা কৰক।
Verse 25
राजसूयजिताॉल्लोकान श्वमेधाभिवर्धितान् । प्राप्रुहि त्वं महाबाहो तपसश्न महाफलम्,“महाबाहो! राजसूय यज्ञद्वारा जीते हुए तथा अश्वमेध यज्तद्वारा वृद्धिको प्राप्त हुए पुण्य लोकोंको प्राप्त करो और अपने तपके महान् फलको भोगो
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে মহাবাহু! ৰাজসূয় যজ্ঞে লাভ কৰা আৰু অশ্বমেধ যজ্ঞে অধিক বর্ধিত সেই পুণ্যলোকসমূহ প্ৰাপ্ত কৰা; আৰু তোমাৰ তপস্যাৰ মহাফল ভোগ কৰা।
Verse 26
उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्छिर । हरिश्वन्द्रसमा: पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि,“कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें प्राप्त हुए सम्पूर्ण लोक राजा हरिश्वन्द्रके लोकोंकी भाँति सब राजाओंके लोकोंसे ऊपर हैं; जिनमें तुम विचरण करोगे
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে যুধিষ্ঠিৰ, হে পাৰ্থ! তোমাৰ প্ৰাপ্ত লোকসমূহ নিশ্চয়েই অন্য ৰজাসকলৰ লোকতকৈ অধিক উচ্চ—ৰাজা হৰিশ্চন্দ্ৰৰ লোকসম; সেই উচ্চ লোকত তুমি বিচৰণ কৰিবা।
Verse 27
मान्धाता यत्र राजर्षियत्र राजा भगीरथ: । दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि
বৈশম্পায়নে ক’লে— য’ত ৰাজর্ষি মান্ধাতা আছে, য’ত ৰজা ভগীৰথ আছে, আৰু য’ত দুষ্যন্তপুত্ৰ ভৰত আছে—সেই লোকতেই তুমিও আনন্দে বিচৰণ কৰিবা।
Verse 28
“जहाँ राजर्षि मान्धाता, राजा भगीरथ और दुष्यन्तकुमार भरत गये हैं, उन्हीं लोकोंमें तुम भी विहार करोगे ।। एषा देवनदी पुण्या पार्थ त्रैलोक्यपावनी । आकाशगड़् राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि,'पार्थ! ये तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली पुण्यसलिला देवनदी आकाशगड़ा हैं। राजेन्द्र! इनके जलमें गोता लगाकर तुम दिव्य लोकोंमें जा सकोगे
বৈশম্পায়নে ক’লে— য’ত ৰাজর্ষি মান্ধাতা, ৰজা ভগীৰথ আৰু দুষ্যন্তপুত্ৰ ভৰত গ’ল, সেই একে লোকসমূহতে তুমিও বিচৰণ কৰিবা। হে পাৰ্থ! এই দেৱনদী পুণ্যময়, ত্ৰিলোক-পাৱনী—আকাশগঙ্গা। হে ৰাজেন্দ্ৰ! ইয়াৰ জলে নিমজ্জিত হৈ তুমি দিব্য লোকসমূহলৈ গমন কৰিবা।
Verse 29
अत्र स्नातस्य भावस्ते मानुषो विगमिष्यति । गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि,“मन्दाकिनीके इस पवित्र जलमें स्नान कर लेनेपर तुम्हारा मानव-स्वभाव दूर हो जायगा। तुम शोक, संताप और वैरभावसे छुटकारा पा जाओगे”
ইয়াত স্নান কৰিলে তোমাৰ মানৱ-ভাব দূৰ হৈ যাব। তুমি শোকমুক্ত, ক্লেশহীন, আৰু বৈৰভাবৰ পৰা মুক্ত হ’বা।
Verse 30
एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम् । धर्मो विग्रहवान् साक्षादुवाच सुतमात्मन:,देवराज इन्द्र जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय शरीर धारण करके आये हुए साक्षात् धर्मने अपने पुत्र कौरवराज युधिष्ठिससे कहा--
দেৱেন্দ্ৰ ইন্দ্ৰ কৌৰবেন্দ্ৰ যুধিষ্ঠিৰক এইদৰে ক’বলৈ ধৰোঁতেই, সাক্ষাৎ ধৰ্ম দেহধাৰী হৈ প্ৰত্যক্ষ হৈ নিজৰ পুত্ৰক সম্বোধন কৰিলে।
Verse 31
भो भो राजन महाप्राज्ञ प्रीतो5स्मि तव पुत्रक । मद्धकत्या सत्यवाक्यैश्नल क्षमया च दमेन च,“महाप्राज्ञ नरेश! मेरे पुत्र! तुम्हारे धर्मविषयक अनुराग, सत्यभाषण, क्षमा और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ
হে হে ৰাজন, মহাপ্ৰাজ্ঞ! মোৰ পুত্ৰ! মোৰ প্ৰতি তোমাৰ ভক্তি, সত্যবচন, ক্ষমা আৰু ইন্দ্ৰিয়দমে মই অতি প্ৰীত।
Verse 32
एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन् कृता मया | न शकक््यसे चालयितु स्वभावात् पार्थ हेतुतः,“राजन! यह मैंने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। पार्थ! किसी भी युक्तिसे कोई तुम्हें अपने स्वभावसे विचलित नहीं कर सकता
হে ৰাজন! এইটো আছিল মই লোৱা তোমাৰ তৃতীয় পৰীক্ষা। হে পাৰ্থ! কোনো হেতু বা যুক্তিৰে তোমাক তোমাৰ স্বভাৱৰ পৰা বিচলিত কৰিব নোৱাৰি।
Verse 33
पूर्व परीक्षितो हि त्व॑ं प्रश्नाद् द्वैृतवने मया । अरणीसहितस्यार्थ तच्च निस्तीर्णवानसि,'द्वैतववनमें अरणिकाष्ठका अपहरण करनेके पश्चात् जब यक्षके रूपमें मैंने तुमसे कई प्रश्न किये थे वह मेरे द्वारा तुम्हारी पहली परीक्षा थी। उसमें तुम भलीभाँति उत्तीर्ण हो गये
বৈশম্পায়নে ক’লে—আগতে দ্বৈতবনত, অৰণী-কাঠ অপহৃত হোৱাৰ পাছত, প্ৰশ্নৰ দ্বাৰা মই তোমাক পৰীক্ষা কৰিছিলোঁ। সেই পৰীক্ষাত তুমি উত্তমভাৱে উত্তীৰ্ণ হৈছিলা।
Verse 34
सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत । श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्व॑ मे परीक्षित:,“भारत! फिर द्रौपदीसहित तुम्हारे सभी भाइयोंकी मृत्यु हो जानेपर कुत्तेका रूप धारण करके मैंने दूसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। उसमें भी तुम सफल हुए
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে ভাৰত! তাত দ্ৰৌপদীৰ সৈতে তোমাৰ সহোদৰ ভ্ৰাতাসকল বিনষ্ট হোৱাৰ পাছত, কুকুৰৰ ৰূপ ধৰি মই দ্বিতীয়বাৰ তোমাক পৰীক্ষা কৰিছিলোঁ। সেই পৰীক্ষাতো তুমি অচঞ্চল বুলি প্ৰমাণিত হৈছিলা।
Verse 35
इदं तृतीयं भ्रातृणामर्थ यत् स्थातुमिच्छसि । विशुद्धोईसि महाभाग सुखी विगतकल्मष:,“अब यह तुम्हारी परीक्षाका तीसरा अवसर था; किंतु इस बार भी तुम अपने सुखकी परवा न करके भाइयोंके हितके लिये नरकमें रहना चाहते थे, अतः महाभाग! तुम इस तरहसे शुद्ध प्रमाणित हुए। तुममें पापका नाम भी नहीं है; अत: सुखी होओ
বৈশম্পায়নে ক’লে—এইটো তোমাৰ তৃতীয় পৰীক্ষা, ভ্ৰাতৃকল্যাণৰ বিষয়ে। নিজৰ সুখক উপেক্ষা কৰি তুমি তেওঁলোকৰ বাবে (নৰকতো) থাকিবলৈ ইচ্ছা কৰিছিলা; সেয়ে, হে মহাভাগ, তুমি বিশুদ্ধ বুলি প্ৰমাণিত হ’লা। তুমি কল্মষৰহিত; সুতৰাং সুখী হোৱা।
Verse 36
नच ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते । मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता,'पार्थ! प्रजानाथ! तुम्हारे भाई नरकमें रहनेके योग्य नहीं हैं। तुमने जो उन्हें नरक भोगते देखा है वह देवराज इन्द्रद्वारा प्रकट की हुई माया थी
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে পাৰ্থ, প্ৰজানাথ! তোমাৰ ভ্ৰাতাসকল নৰকৰ যোগ্য নহয়। তুমি তেওঁলোকক নৰকযাতনা ভোগ কৰা যেন দেখিছিলা, সেয়া দেৱৰাজ মহেন্দ্ৰ (ইন্দ্ৰ) দ্বাৰা প্ৰদৰ্শিত মায়া মাত্ৰ।
Verse 37
अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्या: सर्वराजभि: । ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्त दुःखमुत्तमम्,“तात! समस्त राजाओंको नरकका दर्शन अवश्य करना पड़ता है; इसलिये तुमने दो घड़ीतक यह महान् दु:ख प्राप्त किया है
বৈশম্পায়নে ক’লে—বৎস! সকলো ৰজাই অৱশ্যম্ভাৱীভাৱে নৰকসমূহ দৰ্শন কৰিবলগীয়া হয়। সেয়ে তুমি এই পৰম দুখ কেৱল অল্পক্ষণৰ বাবে ভোগ কৰিছা।
Verse 38
न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ | कर्णो वा सत्यवाक् शूरो नरकार्ह श्चिरं नृप
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে ৰাজন! ন সব্যসাচী অৰ্জুন, ন ভীম, ন সেই যমজ দুজন (নকুল-সহদেৱ) পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ, আৰু ন সত্যবাক বীৰ কৰ্ণ—ইহঁতৰ কোনোজনেই দীঘলীয়া সময় নৰকত থাকিবলৈ যোগ্য নাছিল।
Verse 39
“नरेश्वर! सव्यसाची अर्जुन, भीमसेन, पुरुषप्रवर नकुल-सहदेव अथवा सत्यवादी शूरवीर कर्ण--इनमेंसे कोई भी चिरकालतक नरकमें रहनेके योग्य नहीं है ।। न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथंचन । एहोहि भरतश्रेष्ठ पश्य गड्जां त्रिलोकगाम्,“भरतश्रेष्ठ) राजकुमारी कृष्णा भी किसी तरह नरकमें जानेयोग्य नहीं है। आओ, त्रिभुवनगामिनी गंगाजीका दर्शन करो”
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! ন সব্যসাচী অৰ্জুন, ন ভীমসেন, ন পুৰুষপ্ৰৱৰ নকুল-সহদেৱ, আৰু ন সত্যবাদী শূৰবীৰ কৰ্ণ—ইহঁতৰ কোনোজনেই দীঘলীয়া সময় নৰকত বাস কৰিবলৈ যোগ্য নহয়। আৰু ৰাজকন্যা কৃষ্ণাও কোনোপধ্যেই নৰকাৰ্হা নহয়। আহা, হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! ত্ৰিলোকগামিনী গঙ্গাৰ দৰ্শন কৰা।
Verse 40
एवमुक्त: स राजर्षिस्तव पूर्वपितामह: । जगाम सह धर्मेण सर्वैक्ष त्रिदिवालयै:,जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गड़ाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে জনমেজয়! ধৰ্মে এনেদৰে কোৱাৰ পাছত তোমাৰ পূৰ্বপিতামহ ৰাজর্ষি (যুধিষ্ঠিৰ) ধৰ্মৰ সৈতে আৰু স্বৰ্গবাসী সকলো দেৱতাৰ সৈতে আগবাঢ়িল।
Verse 41
गड्ढां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम् । अवगाहा ततो राजा तनुं तत्याज मानुषीम्,जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गड़ाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে জনমেজয়! তেতিয়া ৰজাই ঋষিসকলৰ দ্বাৰা সংস্তুত, পুণ্য আৰু পাৱন দেৱনদী গঙ্গাত অৱগাহন কৰিলে; আৰু স্নান কৰি তৎক্ষণাৎ নিজৰ মানৱ দেহ ত্যাগ কৰিলে।
Verse 42
ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्िर: । निर्वेरो गतसंतापो जले तस्मिन् समाप्लुत:,तत्पश्चात् दिव्यदेह धारण करके धर्मराज युधिष्ठिर वैरभावसे रहित हो गये। मन्दाकिनीके शीतल जलमें स्नान करते ही उनका सारा संताप दूर हो गया
বৈশম্পায়নে ক’লে—তাৰ পাছত ধৰ্মৰাজ যুধিষ্ঠিৰে দিব্য দেহ ধাৰণ কৰিলে। বৈৰভাবমুক্ত হৈ, সকলো সান্তাপ দূৰ কৰি, তেওঁ সেই জলে নিমজ্জিত হ’ল।
Verse 43
लोहकुम्भ्य: शिलाश्वैव नादृश्यन्त भयानका: । वहाँ पापकर्मी पुरुषोंको जो यातनाएँ दी जाती थीं वे सहसा अदृश्य हो गयीं। न वैतरणी नदी रह गयी, न कूटशाल्मलि वृक्ष। लोहेके कुम्भ और लोहमयी भयंकर तप्त शिलाएँ भी नहीं दिखायी देती थीं,ततो ययौ वृतो देवै: कुरुराजो युधिष्ठिर: । धर्मेण सहितो धीमान् स्तूयमानो महर्षिभि: तत्पश्चात् देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्छठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे
ভয়ংকৰ লোহাৰ কুম্ভ আৰু লোহাৰ দৰে দহি থকা শিলাবোৰ এতিয়া আৰু দেখা নগ’ল। তেতিয়া দেৱতাসকলৰ দ্বাৰা পৰিবেষ্টিত, ধৰ্মক সংগ লৈ, মহর্ষিসকলৰ মুখেৰে নিজৰ স্তৱ শুনি শুনি বুদ্ধিমান কুৰুৰাজ যুধিষ্ঠিৰ আগুৱাই গ’ল। ক্ৰোধ ত্যাগ কৰি আনন্দেৰে নিজ নিজ স্থানত বাস কৰা পুৰুষসিংহ বীৰ পাণ্ডৱসকল আৰু ধৃতৰাষ্ট্ৰৰ পুত্ৰসকল থকা সেই লোকৰ দিশে তেওঁ গ’ল।
Verse 44
यत्र ते पुरुषव्याप्रा: शूरा विगतमन्यव: । पाण्डवा धार्तराष्ट्रश्न स्वानि स्थानानि भेजिरे,तत्पश्चात् देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्छठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे
য’ত সেই পুৰুষব্যাঘ্ৰ বীৰসকল—ক্ৰোধমুক্ত—পাণ্ডৱ আৰু ধৃতৰাষ্ট্ৰৰ পুত্ৰসকলে নিজ নিজ নিৰ্ধাৰিত স্থান গ্ৰহণ কৰিছিল। তাৰ পিছত দেৱতাসকলৰ দ্বাৰা পৰিবেষ্টিত, ধৰ্মক সংগ লৈ, মহর্ষিসকলৰ মুখেৰে নিজৰ স্তৱ শুনি শুনি বুদ্ধিমান কুৰুৰাজ যুধিষ্ঠিৰ সেই অঞ্চললৈ গ’ল; তাত সিংহসম বীৰসকল আনন্দেৰে নিজ নিজ স্থানত বাস কৰিছিল।
Verse 66
ववौ देवसमीपस्थ: शीतलो5तीव भारत | कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी
হে ভাৰত! দেৱতাসকলৰ সান্নিধ্যত বোৱা সেই বতাহ অতি শীতল যেন লাগিছিল। কুৰুকুলনন্দন ৰজা যুধিষ্ঠিৰে তাত চাৰিওফালে দেখা বিকৃত দেহসমূহ সকলো অদৃশ্য হৈ গ’ল। তাৰ পিছত তাত পৱিত্ৰ সুগন্ধ বহন কৰা, শুদ্ধ আৰু সুখদায়িনী বায়ু ব’বলৈ ধৰিলে।
Verse 93
युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वच: । तदनन्तर उत्तम शोभासे सम्पन्न देवराज इन्द्रने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा
তাৰ পিছত উত্তম শোভাৰে দীপ্ত দেৱৰাজ ইন্দ্ৰই যুধিষ্ঠিৰক সান্ত্বনা দি, কোমল বাক্যে এইদৰে ক’লে।
Verse 131
एहोहि पुरुषव्यात्र कृतमेतावता विभो । सिद्धि: प्राप्ता महाबाहो लोकाश्षाप्यक्षयास्तव
“আহাঁ, হে পুৰুষব্যাঘ্ৰ, হে বিভো! ইমানেই যথেষ্ট। হে মহাবাহু! তুমি সিদ্ধি লাভ কৰিছা; আৰু তোমাৰ লোকসমূহো অক্ষয়।”
Verse 153
व्याजेनैव ततो राजन् दर्शितो नरकस्तव । “नरेश्वर! मैंने तुम्हारे कल्याणकी इच्छासे तुम्हें पहले ही इस प्रकार नरकका दर्शन करानेके लिये यहाँ भेज दिया है। राजन! तुमने गुरुपुत्र अश्वत्थामाके विषयमें छलसे काम लेकर द्रोणाचार्यको उनके पुत्रकी मृत्युका विश्वास दिलाया था, इसलिये तुम्हें भी छलसे ही नरक दिखलाया गया है
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে ৰাজন, কেৱল এটা ব্যাজ (ছল-উপায়)ৰ দ্বাৰাই তোমাক নৰক দেখুওৱা হৈছিল। যেনেকৈ তুমি দ্ৰোণাচাৰ্যক তেওঁৰ পুত্ৰ অশ্বত্থামাৰ বিষয়ে ছল কৰি ‘পুত্ৰ মৃত্যু হৈছে’ বুলি বিশ্বাস কৰাইছিলা, তেনেকৈ ছল-উপায়েৰে তোমাকো নৰকৰ দর্শন কৰোৱা হ’ল।
Verse 1636
द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गता: । 'जैसे तुम यहाँ लाये गये थे उसी प्रकार भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा ट्रपदकुमारी कृष्णा--ये सभी छलसे नरकके निकट लाये गये थे
বৈশম্পায়নে ক’লে—দ্ৰৌপদী, যাক কৃষ্ণা বুলিও কোৱা হয়, এটা ব্যাজ (ছল-প্ৰসঙ্গ)ৰ দ্বাৰা নৰকৰ দিশে নিয়া হৈছিল। যেনেকৈ তোমাক ইয়ালৈ অনা হৈছিল, তেনেকৈ ভীমসেন, অৰ্জুন, নকুল, সহদেৱ আৰু দ্ৰুপদ-কন্যা কৃষ্ণা—এই সকলোকে ছল কৰি নৰকৰ ওচৰলৈ অনা হৈছিল।
The chapter confronts how a righteous king should respond when reality appears to contradict moral expectation—whether to accept personal elevation or to remain loyal to companions and to truth, even amid distressing visions.
Karmic results are depicted as temporally ordered rather than simplistic: merit and demerit may ripen in different sequences, and apparent injustice can function as a limited, instructive ordeal rather than a final verdict.
Yes: Dharma states the vision was māyā arranged by Indra, clarifies it as Yudhiṣṭhira’s third examination, and presents immersion in the celestial Gaṅgā as the transition point where the human state is relinquished and reconciliation is completed.