धर्म्यविजय-नियमाः
Rules for Dharmic Victory in Kṣatriya Engagement
मम धर्मबलिं दत्त किं वा मां प्रतिपत्स्थथ । ते चेत् तमागतं तत्र वृणुयु: कुशलं भवेत्,भीष्मजीने कहा--राजन्! पहले राजा सहायकोंके साथ अथवा बिना सहायकोंके ही जिसपर विजय पाना चाहता हो, उस राज्यमें जाकर वहाँके लोगोंसे कहे कि मैं तुम्हारा राजा हूँ और सदा तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा, मुझे धर्मके अनुसार कर दो अथवा मेरे साथ युद्ध करो। उसके ऐसा कहनेपर यदि वे उस समागत नरेशका अपने राजाके रूपमें वरण कर लें तो सबकी कुशल हो
mama dharmabaliṁ datta kiṁ vā māṁ pratipatsthatha | te cet tam āgataṁ tatra vṛṇuyuḥ kuśalaṁ bhavet ||
ভীষ্ম ক’লে—ৰাজন! ধৰ্ম অনুসাৰে যি কৰ (বলি) দিব লাগে, সেয়া মোক দিয়া; নতুবা যুদ্ধত মোৰ প্ৰতিবাদ কৰা। মই তাত উপস্থিত হ’লে যদি সেই দেশৰ লোকসকলে আগত নৃপতিক নিজৰ ৰজা হিচাপে গ্ৰহণ কৰে, তেন্তে সকলোৰে মঙ্গল আৰু শৃঙ্খলা স্থিৰ হ’ব।
भीष्म उवाच