Prāyaścitta-vidhāna: Tapas, Dāna, Vrata, and Proportional Expiation (प्रायश्चित्तविधानम्)
“धर्मात्मा पुरुषको चाहिये कि वह यशके लोभसे, भयके कारण अथवा अपना उपकार करनेवालेको दान न दे अर्थात् उसे जो दिया जाय वह दान नहीं है, ऐसा समझना चाहिये। जो नाचने-गानेवाले, हँसी-मजाक करनेवाले (भाँड़ आदि), मदमत्त, उन्मत्त, चोर, निन्दक, गूँगे, कान्तिहीन, अड्भगहीन, बौने, दुष्ट, दूषित कुलमें उत्पन्न तथा व्रत एवं संस्कारसे शून्य हों, उन्हें भी दान न दे। श्रोत्रियके सिवा वेदज्ञानशून्य ब्राह्मणको दान नहीं देना चाहिये || ३६-- ३८ ।। असम्यक् चैव यद् दत्तमसम्यक् च प्रतिग्रह: । उभयं स्यादनर्थाय दातुरादातुरेव च,“जो उत्तम विधिसे दिया न गया हो तथा जिसे उत्तम विधिके साथ ग्रहण न किया गया हो, वह देना और लेना दोनों ही देने और लेनेवालेके लिये अनर्थकारी होते हैं
asamyak caiva yad dattam asamyak ca pratigrahaḥ | ubhayaṃ syād anarthāya dātur ādātur eva ca ||
ব্যাসে ক’লে—যথাবিধি দিয়া নোহোৱা দান আৰু যথাবিধি গ্ৰহণ নকৰা প্ৰতিগ্ৰহ—এই দুয়োটাই দাতা আৰু গ্ৰহীতা, উভয়ৰ বাবে অনৰ্থকাৰী হয়।
व्यास उवाच