Nāga-āyatana-darśana-pratīkṣā — The Brāhmaṇa’s Request and Waiting on the Gomatī
नरनारायणो द्रष्ठूं कारणं तद् ब्रवीहि मे । नारदजीने जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित हुए जगन्नाथ श्रीहरिका दर्शन किया और पुनः जो वे वहाँसे देवश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये उनके पास दौड़े गये, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये,हव्यं कव्यं च सततं विधियुक्तं प्रयुड्जते । कृत्स्नं तु तस्य देवस्थ चरणावुपतिष्ठति वे अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंकी आवृत्ति करते हुए अत्यन्त कठोर तपस्यामें संलग्न हैं। ब्रह्मा, स्वयं महादेव, सम्पूर्ण ऋषि और शेष, श्रेष्ठ देवता तथा दैत्य, दानव, राक्षस, नाग, गरुड, गन्धर्व, सिद्ध एवं राजर्षिगण सदा विधिपूर्वक जो हव्य और कव्य अर्पण करते हैं, वह सब कुछ उन्हीं भगवानके चरणोंमें उपस्थित होता है
śaunaka uvāca |
nara-nārāyaṇo draṣṭuṁ kāraṇaṁ tad bravīhi me |
havyaṁ kavyaṁ ca satataṁ vidhiyuktaṁ prayujyate |
kṛtsnaṁ tu tasya devastha caraṇāv upatiṣṭhati ||
শৌনকে ক’লে—“ইয়াৰ কাৰণ মোক কোৱা: অনিরুদ্ধ-ৰূপত স্থিত জগন্নাথ শ্ৰীহৰিক দৰ্শন কৰি নাৰদ পুনৰ দেৱশ্ৰেষ্ঠ নৰ-নাৰায়ণক দৰ্শন কৰিবলৈ কিয় ত্বৰিত হ’ল? কিয়নো তেওঁলোকৰ উদ্দেশে সদায় বিধিমতে হব্য আৰু কব্য অৰ্পণ কৰা হয়; আৰু সেই অৰ্পণৰ সমগ্ৰ ফল শেষত তেওঁলোকৰ দিৱ্য চৰণত আহি স্থিত হয়।”
शौनक उवाच