धर्मद्वारबहुत्वविमर्शः — Reflection on the Many ‘Doors’ of Dharma (Śānti-parva 342)
गौणानि तत्र नामानि कर्मजानि च कानिचित् । निरुक्त कर्मजानां त्वं शृणुष्व प्रयतो5नघ,उनमें कुछ नाम तो गुणोंके अनुसार हैं और कुछ कर्मोंसे हुए हैं। निष्पाप अर्जुन! तुम पहले एकाग्रचित होकर मेरे कर्मजनित नामोंकी व्याख्या सुनो
gauṇāni tatra nāmāni karmajāni ca kānicit | niruktaṃ karmajānāṃ tvaṃ śṛṇuṣva prayato 'nagha ||
সেই ঠাইত কিছুমান নাম গুণানুসাৰে গৌণ, আৰু কিছুমান নাম কৰ্মজাত। হে নিষ্পাপ! একাগ্ৰচিত্তে প্ৰথমে মোৰ কৰ্মজন্য নামসমূহৰ নিৰুক্তি শুনা।
अर्जुन उवाच