नारायणीयमाख्यानम् (Nārāyaṇīyam Ākhyānam) — Nārada’s Return and Hymnic Consolidation
इन्द्रने सरस और सुगन्धित जलकी वर्षा की तथा दिव्य गन्ध फैलाती हुई परम पवित्र वायु चलने लगी ।। स शद्ले प्रथमे दिव्ये हिमवन्मेरुसम्भवे । संश्लिष्टे श्वेतपीते द्वे रुक्मरूप्यमये शुभे,भरतनन्दन! आगे बढ़नेपर श्रीशुकदेवजीने पर्वतके दो दिव्य एवं सुन्दर शिखर देखे, जो एक-दूसरेसे सटे हुए थे। उनमेंसे एक हिमालयका शिखर था और दूसरा मेरुपर्वतका। हिमालयका शिखर रजतमय होनेके कारण श्वेत दिखायी देता था और सुमेरुका स्वर्णमय शंंग पीले रंगका था। इन दोनोंकी लंबाई-चौड़ाई और ऊँचाई सौ-सौ योजनकी थी। उत्तरदिशाकी ओर जाते समय ये दोनों सुरम्य शिखर शुकदेवजीकी दृष्टिमें पड़े
indrena sarasaṃ sugandhitaṃ ca jalaṃ vṛṣṭaṃ divyagandhaṃ vikīrṇayantī paramapavitrā vāyur vavau || sa śaile prathame divye himavanmerusambhave | saṃśliṣṭe śvetapīte dve rukmarūpyamaye śubhe bharatanandana ||
ভীষ্মে ক’লে— তাৰ পিছত উত্তৰ দিশলৈ আগবাঢ়োঁতে শুকদেৱে পৰস্পৰে সংলগ্ন দুটা দিব্য আৰু শুভ পৰ্বতশৃঙ্গ দেখিলে—এটা হিমৱানৰ, ৰূপৰ দৰে শ্বেত দীপ্তিময়; আনটো মেরুৰ, সোণৰ দৰে পীত জ্যোতিৰে উজ্জ্বল।
भीष्म उवाच