देवतापितृप्रश्नः — Nārada at Badarīāśrama: the ultimate referent of daiva and pitṛ worship
उष्णां वैतरणीं महानदी- मवगाढो5सिपत्रवनभिन्नगात्र: | परशुवनशयो निपतितो वसति च महानिरये भृशार्त:,उसे अत्यन्त उष्ण महानदी वैतरणीमें गोता लगाना पड़ता है। असिपत्रवनमें उसका अंग-अंग छिजन्न-भिन्न हो जाता है और परशुवनमें उसे शयन करना पड़ता है। इस प्रकार महानरकमें पड़कर वह अत्यन्त आतुर हो उठता है और विवश होकर उसीमें निवास करता है
uṣṇāṃ vaitaraṇīṃ mahānadīm avagāḍho ’sipattra-vanabhinna-gātraḥ | paraśu-vanaśayo nipatito vasati ca mahāniraye bhṛśārtaḥ ||
ব্যাসে ক’লে—তাক অতি উষ্ণ মহা নদী বৈতৰণীত ডুবাই দিয়া হয়; অসিপত্রবনত তাৰ অঙ্গ-প্ৰত্যঙ্গ ছিন্নভিন্ন হয়; আৰু পৰশুবনত পেলাই দি তাতেই শুবলৈ বাধ্য কৰা হয়। এইদৰে মহা নৰকত পতিত হৈ সি ভয়ংকৰ যন্ত্রণাত কাতৰ হয় আৰু নিৰ্বশ হৈ তাতেই বাস কৰে।
व्यास उवाच