नारद–असित (देवल) संवादः — भूतप्रभवाप्यय, इन्द्रिय-गुण-विवेक, क्षेत्रज्ञ-तत्त्व
यज्ञ वहन्ति सम्भूय सहर्व्विग्भि: सदक्षिणै: । संहृत्यैतानि सर्वाणि यज्ञ निर्वर्तयन्त्युत,ऋत्विक् और दक्षिणाओंके साथ ये सब मिलकर यज्ञका निर्वाह करते हैं। यजमान इन सारी वस्तुओंका संग्रह करके यज्ञका अनुष्ठान करते हैं
yajñaṁ vahanti sambhūya sahar̥tvigbhiḥ sadakṣiṇaiḥ | saṁhr̥tyaitāni sarvāṇi yajñaṁ nirvartayanty uta ||
ঋত্বিকসকলৰ সৈতে আৰু বিধেয় দক্ষিণাসহ একেলগে এই সকলোয়ে যজ্ঞক আগবঢ়াই নিয়ে। যজমান সকলো সামগ্ৰী সংগ্ৰহ কৰি যজ্ঞানুষ্ঠান সম্পূৰ্ণ কৰে।
कपिल उवाच