Adhyāya 249 — Mṛtyu-prādurbhāvaḥ (The Manifestation of Death) / Restraint of Tejas and Ordered Saṃhāra
यथा पुष्पफलोपेतो बहुशाखो महाद्रुम: । आत्मनो नाभिजानीते क्व मे पुष्पं क्व मे फलम्,जैसे फल और फूलोंसे भरा हुआ अनेक शाखाओंसे युक्त विशाल वृक्ष अपने ही विषयमें यह नहीं जानता कि कहाँ मेरा फ़ूल है और कहाँ मेरा फल है; उसी प्रकार जीवात्मा यह नहीं जानता कि मैं कहाँसे आया हूँ और कहाँ जाऊँगा। किंतु शरीरमें जीवसे पृथक् दूसरा ही अन्तरात्मा है, जो सबको सब प्रकारसे निरन्तर देखता रहता है
yathā puṣpaphalopeto bahuśākho mahādrumaḥ | ātmano nābhijānīte kva me puṣpaṃ kva me phalam ||
যেনেকৈ ফুল-ফলৰে ভৰা, বহু শাখাবিশিষ্ট মহাবৃক্ষ নিজে নাজানে—‘ক’ত মোৰ ফুল, ক’ত মোৰ ফল’, তেনেকৈ জীৱাত্মাও নাজানে—‘মই ক’ৰ পৰা আহিলোঁ, ক’লৈ যাম’।
व्यास उवाच