Adhyāya 240: Indriya–Manas–Buddhi–Ātman — The Inner Hierarchy and Restraint (इन्द्रिय-मनस्-बुद्धि-आत्म-क्रमः)
धृत्या शिक्षोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा,सत्त्वसंसेवनाद धीरो निद्रामुच्छेत्तुमरहति । विद्वानोंने योगके जो काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवाँ स्वप्र--ये पाँच दोष बताये हैं उनका पूर्णतया उच्छेद करे। इनमेंसे क्रोधको शम (मनोनिग्रह) के द्वारा जीते, कामको संकल्पके त्यागद्वारा पराजित करे तथा धीर पुरुष सत्वगुणका सेवन करनेसे निद्राका उच्छेद कर सकता है मनुष्य धैर्यका सहारा लेकर शिश्न और उदरकी रक्षा करे अर्थात् विषयभोग और भोजनकी चिन्ता दूर कर दे। नेत्रोंकी सहायतासे हाथ और पैरोंकी, मनके द्वारा नेत्र और कानोंकी तथा कर्मके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करे अर्थात् इनको शुद्ध बनावे। सावधानीके द्वारा भयका और दिद्दान् पुरुषोंके सेवनसे दम्भका त्याग करे
dhṛtyā śiśnodaraṁ rakṣet pāṇipādaṁ ca cakṣuṣā | sattvasaṁsevanād dhīro nidrām ucchettum arhati ||
ব্যাসে ক’লে—ধৈৰ্যৰে শিশ্ন আৰু উদৰ ৰক্ষা কৰিব লাগে; অৰ্থাৎ বিষয়ভোগ আৰু আহাৰাসক্তি সংযত কৰিব লাগে। চকুৰ সাৱধানতাৰে হাত-পা-কে কুকৰ্মৰ পৰা নিবৃত্ত কৰিব লাগে। সত্ত্বসেৱনে ধীৰ পুৰুষ নিদ্ৰা (জড়তা) দূৰ কৰিবলৈ যোগ্য হয়।
व्यास उवाच