Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
तस्मिन्नुपरते5जो5स्य पीतशब्त्र: प्रकाशते । ऊर्णारूपसवर्णस्य तस्य रूप॑ प्रकाशते,उसके भी लय हो जानेपर योगीको आकाशमें सर्वत्र फैले हुए वायुका ही अनुभव होता है। उस समय वृक्ष और पर्वत आदि अपने समस्त शस्त्रोंको पी जानेके कारण वायुकी “पीतशस्त्र' संज्ञा हो जाती है अर्थात् पृथ्वी, जल और तेजरूप समस्त पदार्थोकी निगलकर वायु केवल आकाशगमें ही आन्दोलित होता रहता है और साधक स्वयं भी ऊनके धागेके समान अत्यन्त छोटा और हलका होकर अपनेको निराधार आकाशगमें वायुके साथ ही स्थित मानता है
tasminn uparate 'jo 'sya pītaśastraḥ prakāśate | ūrṇārūpasavarṇasya tasya rūpaṃ prakāśate ||
ব্যাসে ক’লে—সেই তেজো লয় পালে ‘পীতশস্ত্ৰ’ নামে বায়ু প্ৰকাশ পায়, যেন ই অন্য সকলো শক্তি গিলি পেলাইছে। তেতিয়া যোগীয়ে মুক্ত আকাশত সৰ্বত্র বায়ুৰেই ব্যাপ্ত গতি অনুভৱ কৰে। আৰু তাৰ নিজৰ ৰূপ উণৰ তন্তুৰ দৰে অতি সূক্ষ্ম—হালকা, ক্ষুদ্ৰ, যেন নিৰাধাৰ—প্ৰতীয়মান হয়; আকাশৰ বিশালতাত বায়ুৰ সৈতে একেলগে অৱস্থিত যেন লাগে।
व्यास उवाच