Gārhasthya-Śreṣṭhatā and Kṣatriya-Daṇḍadhāraṇa
Householder Primacy and the Royal Duty of Punishment
यज्ञो विद्या समुत्थानमसंतोष: श्रयं प्रति । दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम्,प्रजानाथ! अब मैं पुनः क्षत्रियोंके धर्म बता रहा हूँ, यद्यपि वह तुम्हें भी ज्ञात है। यज्ञ, विद्याभ्यास, शत्रुओंपर चढ़ाई करना, राजलक्ष्मीकी प्राप्तिसे कभी संतुष्ट न होना, दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना, क्षत्रियतेजसे सम्पन्न रहना, प्रजाकी सब ओरसे रक्षा करना, समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना, तप, सदाचार, अधिक द्रव्योपार्जन और सत्पात्रको दान देना--ये सब राजाओंके कर्म हैं, जो सुन्दर ढंगसे किये जानेपर उनके इहलोक और परलोक दोनोंको सफल बनाते हैं, ऐसा हमने सुना है
yajño vidyā samutthānam asantoṣaḥ śriyaṃ prati | daṇḍadhāraṇam ugrātvaṃ prajānāṃ paripālanam ||
যজ্ঞ, বিদ্যাভ্যাস, উদ্যোগ (শত্ৰুৰ বিৰুদ্ধে অভিযানসহ), ৰাজলক্ষ্মী লাভ কৰিও আত্মতুষ্টিত শিথিল নোহোৱা, দণ্ড ধাৰণত সদা প্ৰস্তুত থকা, উগ্ৰ বীৰত্ব, আৰু প্ৰজাৰ পালন‑ৰক্ষা—এইবোৰেই ৰাজধৰ্মৰ লক্ষণ।
व्यास उवाच