यदर्थ धर्मसंसर्ग: कर्मणां च फलोदय: । तमनाश्चवासिकं मोहं विनाशि चलमशध्चुवम्,उन्होंने कहा--'“जिसके लिये धर्मका आचरण किया जाता है, जो कर्मोके फलका उदय होनेपर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोकका भोग नश्चर है। उसपर आस्था करना उचित नहीं। वह मोहरूप, चंचल और अस्थिर है”
তেওঁ ক’লে—“যি উদ্দেশ্যে ধৰ্মাচৰণ কৰা হয় আৰু কৰ্মফল উদয় হ’লে যি ভোগ লাভ হয়, সেয়া নশ্বৰ; তাত আস্থা ৰখা উচিত নহয়। সেয়া মোহস্বরূপ—চঞ্চল, বিনাশী আৰু অস্থিৰ।”
भीष्म उवाच