Bṛhaspati’s Counsel on Contentment
Santoṣa), Restraint, and Adroha (Non-injury
अद्रोहेणैव भूतानां यो धर्म: स सतां मतः । इन सब बातोंपर विचार करके विद्वानोंने ऐसा निश्चय किया है कि किसी भी प्राणीसे द्रोह न करके जिस धर्मका पालन होता है, वही साधु पुरुषोंकी रायमें उत्तम धर्म है ।। १०६ || अद्रोह: सत्यवचनं संविभागो दया दम:,किसीसे ट्रोह न करना, सत्य बोलना, (बलिवैश्वदेव कर्मद्वारा) समस्त प्राणियोंको यथायोग्य उनका भाग समर्पित करना, सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना, मन और इन्द्रियोंका संयम करना, अपनी ही पत्नीसे संतान उत्पन्न करना तथा मृदुता, लज्जा एवं अचंचलता आदि गुणोंको अपनाना--ये श्रेष्ठ एवं अभीष्ट धर्म हैं--ऐसा स्वायम्भुव मनुका कथन है
adroheṇaiva bhūtānāṃ yo dharmaḥ sa satāṃ mataḥ | adrohaḥ satyavacanaṃ saṃvibhāgo dayā damaḥ |
দেৱস্থান ক’লে—সকলো প্ৰাণীৰ প্ৰতি অদ্ৰোহেৰে যি ধৰ্ম আচৰণ কৰা হয়, সৎলোকৰ মতে সেয়াই সত্য ধৰ্ম। অদ্ৰোহ, সত্যবচন, ন্যায়সঙ্গত সংবিভাগ আৰু প্ৰাণীসকলক যথোচিত ভাগ অৰ্পণ, দয়া আৰু দম (আত্মসংযম)—এইবোৰেই শ্ৰেষ্ঠ আৰু অভীষ্ট ধৰ্ম বুলি ঘোষণা কৰা হৈছে।
देवस्थान उवाच