Bhīmasena’s Counsel on Grief, Inner Conflict, and the Duty of Kingship (भीमसेन-उपदेशः)
(बलिनो हि वयं राजन् देवैरपि सुदुर्जया: । कथं भृत्यत्वमापन्ना विराटनगरे समर ।।) “राजन्! हम बलवान हैं, देवताओंके लिये भी हमें परास्त करना कठिन होगा तो भी विराटनगरमें हमें कैसे दासता करनी पड़ी थी, इसे याद कीजिये ।। यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिंदम । मनसैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम्,'शत्रुदमन नरेश! द्रोणाचार्य और भीष्मके साथ जो आपका युद्ध हुआ था, वैसा ही दूसरा युद्ध आपके सामने उपस्थित है, इस समय आपको एकमात्र अपने मनके साथ युद्ध करना है
vaiśampāyana uvāca |
balino hi vayaṃ rājan devair api sudurjayāḥ |
kathaṃ bhṛtyatvam āpannā virāṭanagare sma ra ||
yac ca te droṇabhīṣmābhyāṃ yuddham āsīd arindama |
manasaikena yoddhavyaṃ tat te yuddham upasthitam ||
হে ৰাজন! আমি বলবান; দেৱতাসকলৰ পক্ষেও আমাক জয় কৰা অতি দুৰূহ। তথাপি বিরাটনগৰত আমাক দাসত্ব গ্ৰহণ কৰিবলগীয়া হৈছিল—সেয়া স্মৰণ কৰা। আৰু শত্রুদমন নৃপ! দ্ৰোণ আৰু ভীষ্মৰ সৈতে যি যুদ্ধ তুমি সন্মুখীন হৈছিলা, তেনে এক যুদ্ধ এতিয়া তোমাৰ আগত উপস্থিত—এই মুহূর্তত তোমাক কেৱল নিজৰ মনৰ সৈতে যুদ্ধ কৰিব লাগিব।
वैशम्पायन उवाच