अविश्वास-निति: ब्रह्मदत्त–पूजनी-संवादः
Policy of Caution: The Brahmadatta–Pūjanī Dialogue
यो वै न देवान् न पितृन् न मर्त्यान हविषार्चति । अनर्थकं धन तत्र प्राहुर्धमविदो जना:,राजन! जो खानेयोग्य नहीं हैं, उन ओषधियों या वृक्षोंको काटकर मनुष्य उनके द्वारा खानेयोग्य ओषधियोंको पकाते हैं। इसी प्रकार जो देवताओं, पितरों और मनुष्योंका हविष्यके द्वारा पूजन नहीं करता है, उसके धनको धर्मज्ञ पुरुषोंने व्यर्थ बताया है। अतः धर्मात्मा राजा ऐसे धनको छीन ले और उसके द्वारा प्रजाका पालन करे, किंतु वैसे धनसे राजा अपना कोश न भरे
bhīṣma uvāca | yo vai na devān na pitṝn na martyān haviṣārcati | anarthakaṃ dhanaṃ tatra prāhur dharmavido janāḥ ||
ভীষ্মে ক’লে— যি ব্যক্তি হৱিষ্যৰ দ্বাৰা ন দেৱতা, ন পিতৃগণ, ন মানুহক পূজা কৰে, তাৰ ধনক ধৰ্মবিদসকলে নিষ্ফল আৰু অৰ্থহীন বুলি কয়।
भीष्म उवाच