Vṛddha-kanyā-carita and Balarāma’s Kurukṣetra Inquiry (वृद्धकन्या-चरितम् / कुरुक्षेत्रफल-प्रश्नः)
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ,ऋषयश्षक्रिरे धर्म योडनूचान: स नो महान् | “न बहुत वर्षोकी अवस्था होनेसे, न बाल पकनेसे, न धनसे और न अधिक भाई- बन्धुओंसे कोई बड़ा होता है। ऋषियोंने हमारे लिये यही धर्म निश्चित किया है कि हममेंसे जो वेदोंका प्रवचन कर सके, वही महान् है” ।। एतच्छुत्वा वचस्तस्य मुनयस्ते विधानत:
ṛṣayaś cakrire dharmaṃ yo ’dhītya anūcānaḥ sa no mahān | na bahu-varṣāvasthayā na keśa-pākāt na dhanena na ca bahubhir bhrātṛ-bandhubhiḥ kaścid mahān bhavati | ṛṣibhir asmākam etad eva dharma-niścitaṃ yat asmāsu yo vedān pravacituṃ śaknoti sa eva mahān iti || etac chrutvā vacas tasya munayas te vidhānataḥ |
ঋষিসকলে আমাৰ বাবে এই ধৰ্ম স্থিৰ কৰিলে—“আমাৰ মাজত যি বেদ অধ্যয়ন কৰি উপদেশ দিব পাৰে, সেয়াই মহান। বহু বয়স, পকা চুলি, ধন, বা বহু আত্মীয়-স্বজন—এইবোৰে মহত্ত্ব আনে নোৱাৰে।” তেওঁৰ এই বাক্য শুনি সেই মুনিসকলে বিধিমতে গ্ৰহণ কৰিলে।
वैशम्पायन उवाच