अध्याय ३: कृपस्य दुर्योधनं प्रति नीत्युपदेशः
Kṛpa’s Counsel to Duryodhana
यत्र यातान्न वो हन्यु: पाण्डवा: कि सृतेन व: । “वीरो! मैं भूतलपर और पर्वतोंमें भी कोई ऐसा स्थान नहीं देखता, जहाँ चले जानेपर तुमलोगोंको पाण्डव मार न सकें; फिर तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है?
yatra yātān na vo hanyuḥ pāṇḍavāḥ kiṃ sṛtena vaḥ |
“বীৰসকল! মই না পৃথিৱীত, না পৰ্বতসমূহত এনে কোনো ঠাই দেখোঁ য’ত গ’লে পাণ্ডৱে তোমালোকক বধ কৰিব নোৱাৰে; তেন্তে পলাই যোৱাত কি লাভ?”
संजय उवाच