धृतराष्ट्रविलापः — Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Inquiry (Śalya-parva, Adhyāya 2)
बालभावमत्तिक्रम्य यौवनस्थांश्व तानहम् मध्यप्राप्तांस्तथा श्र॒ुत्वा हृष्ट आसं तदानघ,निष्पाप संजय! जब मैं यह सुनता था कि मेरे बच्चे बाल्यावस्थाको लाँधकर युवावस्थामें प्रविष्ट हुए हैं और धीरे-धीरे मध्य अवस्थातक पहुँच गये हैं, तब हर्षसे फ़ूल उठता था
হে নিষ্পাপ সঞ্জয়! যেতিয়া মই শুনিছিলোঁ যে মোৰ পুত্ৰসকলে বাল্যাৱস্থা অতিক্ৰম কৰি যৌৱনত প্ৰৱেশ কৰিছে আৰু ক্ৰমে মধ্যাৱস্থালৈও উপনীত হৈছে, তেতিয়া মই হৰ্ষে উল্লসিত হৈ উঠিছিলোঁ।
धघतयाट्र उवाच