Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
कितनोंके मुख, वर्ण और कान्ति शंखके सदृश थे। वे शंखकी मालाओंसे अलंकृत थे और उनके मुखसे शंखध्वनिके समान ही शब्द प्रकट होते थे ।। जटाधरा: पञ्चशिखास्तथा मुण्डा: कृशोदरा: । चरतुर्वष्टा श्षतुर्जिह्ना: शड्कुकर्णा: किरीटिन:,कोई समूचे सिरपर जटा धारण करते थे, कोई पाँच शिखाएँ रखते थे और कितने ही मूड़ मुड़ाये रहते थे। बहुतोंके उदर अत्यन्त कृश थे, कितनोंके चार दाढ़ें और चार जिद्वाएँ थीं। किन्हींके कान खूँटीके समान जान पड़ते थे और कितने ही पार्षद अपने मस्तकपर किरीट धारण करते थे
jaṭādharāḥ pañcaśikhās tathā muṇḍāḥ kṛśodarāḥ | caturdaṃṣṭrāś caturjihvāḥ śaṅkukarṇāḥ kirīṭinaḥ ||
সঞ্জয়ে ক’লে—তেওঁলোকৰ মাজত কিছুমানে সমগ্ৰ মস্তকে জটা ধাৰণ কৰিছিল, কিছুমানে পাঁচ শিখা ৰাখিছিল, আৰু কিছুমান মুণ্ডিত আছিল। বহুজনৰ উদৰ অতি কৃশ আছিল। কিছুমানৰ চাৰিটা দংশনদাঁত আৰু চাৰিটা জিভা আছিল। কিছুমানৰ কাণ খুঁটিৰ দৰে লাগিছিল, আৰু কিছুমানে মস্তকে মুকুট ধাৰণ কৰিছিল।
संजय उवाच