Adhyāya 6: Śibira-dvāra-sthita Bhūta-varṇana and Aśvatthāmā’s Śaraṇāgati to Mahādeva
/ ऑपन-माज बक। डे षष्ठो5 ध्याय: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना धृतराष्ट्र रवाच द्वारदेशे ततो द्रोणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ । अकुर्वातां भोजकृपौ कि संजय वदस्व मे,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! अश्वत्थामाको शिविरके द्वारपर खड़ा देख कृतवर्मा और कृपाचार्यने क्या किया? यह मुझे बताओ
dhṛtarāṣṭra uvāca | dvāradeśe tato droṇim avasthitam avekṣya tau | akurvātāṁ bhojakṛpau kiṁ sañjaya vadasva me ||
ধৃতৰাষ্ট্ৰ ক’লে—সঞ্জয়! শিবিৰৰ দ্বাৰপ্ৰদেশত দ্ৰোণপুত্ৰ অশ্বত্থামাক অৱস্থিত দেখি কৃতবৰ্মা আৰু কৃপাচাৰ্যই কি কৰিলে? মোক কোৱা।
संजय उवाच