कृपोपदेशः — द्रौणेरनिद्रा च
Kṛpa’s Counsel and Drauṇi’s Sleepless Resolve
अ-क्रा् - भोजका अर्थ है भोजवंशी कृतवर्मा। चतुथों5 ध्याय: कृपाचार्यका कल प्रातःकाल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना कृप उवाच दिष्टया ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत । नत्वां वारयितुं शक्तो वज़पाणिरपि स्वयम्,कृपाचार्य बोले--तात! तुम अपनी टेकसे टलने-वाले नहीं हो, सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे मनमें बदला लेनेका दृढ़ विचार उत्पन्न हुआ। तुम्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इस कार्यसे रोक नहीं सकते
kṛpa uvāca |
diṣṭyā te pratikartavye matir jāteyam acyuta |
na tvāṃ vārayituṃ śakto vajrapāṇir api svayam ||
কৃপ ক’লে—হে অচ্যুত, প্ৰতিশোধ সাধনৰ এই দৃঢ় সংকল্প তোমাৰ মনত জাগি উঠা সৌভাগ্য। এই কৰ্মৰ পৰা তোমাক স্বয়ং বজ্ৰপাণি ইন্দ্ৰও নিবৃত্ত কৰিব নোৱাৰে।
कृप उवाच