Chapter 14: Divyāstra-Prayoga and Ṛṣi Intervention (दिव्यास्त्रप्रयोगः ऋषिसमागमश्च)
पूर्वमाचार्यपुत्राय ततो5नन्तरमात्मने । भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्य: स्वस्तीत्युक्त्वा परंतप:,शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने सबसे पहले यह कहा कि “आचार्यपुत्रका कल्याण हो'। तत्पश्चात् अपने और सम्पूर्ण भाइयोंके लिये मंगल-कामना करके उन्होंने देवताओं और सभी गुरुजनोंको नमस्कार किया। इसके बाद “इस ब्रह्मास्त्रसे शत्रुका ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय' ऐसा संकल्प करके सबके कल्याणकी भावना करते हुए अपना दिव्य अस्त्र छोड़ दिया
vaishampāyana uvāca | pūrvam ācāryaputrāya tato 'nantaram ātmane | bhrātṛbhyaś caiva sarvebhyaḥ svastīty uktvā paraṃtapaḥ ||
শত্রু-সন্তাপক অৰ্জুনে প্ৰথমে আচাৰ্যপুত্ৰৰ, তাৰপিছত নিজৰ, আৰু তাৰপিছত সকলো ভ্ৰাতাৰ মঙ্গল কামনা কৰি ‘স্বস্তি’ উচ্চাৰণ কৰিলে।
वैशम्पायन उवाच