सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः
Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament
अहमेको<वशिष्ट स्तु तस्मात् सैन्यान्महामते । मुक्त: कथंचिद् धर्मात्मन् व्यग्राच्च कृतवर्मण:,महामते! धर्मात्मन्! उस विशाल सेनासे अकेला मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूँ। कृतवर्मा दूसरोंको मारनेमें लगा हुआ था; इसीलिये मैं उस संकटसे मुक्त हो सका हूँ
aham eko ’vaśiṣṭas tu tasmāt sainyān mahāmate | muktaḥ kathaṃcid dharmātman vyagrāc ca kṛtavarmaṇaḥ ||
সূতে ক’লে—হে মহামতে, হে ধৰ্মাত্মন! সেই মহাসেনাৰ পৰা একমাত্র মইয়েই অৱশিষ্ট ৰ’লোঁ। কৃতবর্মা আনসকলৰ বধত ব্যস্ত আছিল; সেইবাবে মই কোনো মতে সেই বিপদৰ পৰা মুক্ত হ’ব পাৰিলোঁ।
सूत उवाच