विदुर उवाच आर्या पृथा राजपुत्री नारण्यं गन्तुमर्हति । सुकुमारी च वृद्धा च नित्यं चैव सुखोचिता,विदुर बोले--कुन्तीकुमारो! राजपुत्री आर्या कुन्ती वनमें जाने लायक नहीं हैं। वे कोमल अंगोंवाली और वृद्धा हैं, सदा सुख और आरामके ही योग्य हैं; अतः वे मेरे ही घरमें सत्कारपूर्वक रहेंगी। यह बात तुम सब लोग जान लो। मेरी शुभ कामना है कि तुम वहाँ सर्वथा नीरोग एवं सुखसे रहो
vidura uvāca | āryā pṛthā rājaputrī nāraṇyaṁ gantum arhati | sukumārī ca vṛddhā ca nityaṁ caiva sukhocitā ||
বিদুৰে ক’লে—আৰ্যা ৰাজকন্যা পৃথা (কুন্তী) অৰণ্যলৈ যোৱা যোগ্য নহয়। তেওঁ সুকুমাৰী আৰু বৃদ্ধাও; সদায় সুখ-স্বাচ্ছন্দ্যত অভ্যস্ত।
विदुर उवाच