सभा-पर्व, अध्याय ६१ — द्रौपदी-प्रश्नः, सभाधर्मः, सत्यवचन-नियमः
जातरूपस्य मुख्यस्य अनर्घेयस्थ भारत । एतद् राजन् मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास ताँबे और लोहेकी चार सौ निधियाँ यानी खजानेसे भरी हुई पेटियाँ हैं। प्रत्येकमें पाँच-पाँच द्रोण विशुद्ध सोना भरा हुआ है, वह सारा सोना तपाकर शुद्ध किया हुआ है, उसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती। भारत! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ
jātarūpasya mukhyasya anargheyasya bhārata | etad rājan mama dhana tena dīvyāmy ahaṃ tvayā ||
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভাৰত! মোৰ ওচৰত শ্ৰেষ্ঠ জাতৰূপ সোণ আছে, যাৰ মূল্য অমূল্য। হে ৰাজন! এই মোৰ ধন; ইয়াক দাওঁত ৰাখি মই তোমাৰ সৈতে দ্যূত খেলোঁ।
युधिछिर उवाच