Arjuna’s Northern Conquests: Kimpuruṣa-lands, Hāṭaka, Mānasasaras, and the Harivarṣa Boundary
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं) है ० बकछ। ] अि्ऑशा:<ह - नरकट बेंतकी तरह पोले डंठलका एक पौधा होता है, जो कलम बनानेके काम आता है। (दिग्विजयपर्व) पजञ्चविशो< ध्याय: अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा वैशम्पायन उवाच पार्थ: प्राप्य धनु: श्रेष्ठमक्षय्यौ च महेषुधी । रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुन श्रेष्ठ धनुष, दो विशाल एवं अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वज और अद्भुत सभाभवन पहले ही प्राप्त कर चुके थे; अब वे युधिष्ठिरसे बोले इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें दिग्विजयका संक्षिप्त वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २५ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९६ श्लोक मिलाकर कुल २०३ श्लोक हैं) नशा (0) आज अत+- षड्विशो<5ध्याय: अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय जनमेजय उवाच दिशामभिजयं ब्रह्मन् विस्तरेणानुकीर्तय । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्वरितं महत्
vaiśampāyana uvāca |
pārthaḥ prāpya dhanuḥ śreṣṭham akṣayyau ca maheṣudhī |
rathaṃ dhvajaṃ sabhāṃ caiva yudhiṣṭhiram abhāṣata ||
বৈশম্পায়নে ক’লে—জনমেজয়! পাৰ্থ (অৰ্জুন) শ্ৰেষ্ঠ ধনু, দুটা মহৎ আৰু অক্ষয় তূণীৰ, দিব্য ৰথ, ধ্বজ আৰু অদ্ভুত সভাভৱন আগতেই লাভ কৰিছিল; তাৰ পাছত তেওঁ যুধিষ্ঠিৰক এইদৰে ক’লে।
वैशम्पायन उवाच