अध्याय ४ — द्वारकानिमित्तानि, प्रभासगमनम्, मौसलप्रारम्भः
Omens in Dvārakā, Journey to Prabhāsa, and the Musala Outbreak
वने शून्ये विचरंश्विन्तयानो भूमौ चाथ संविवेशाग्र्यतेजा: । सर्व तेन प्राक्तदा वित्तमासीद् गान्धार्या यद् वाक्यमुक्त: स पूर्वम्,उपर्युक्त सब लोगोंने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की, स्वागतपूर्वक अभिनन्दन किया और अर्घ्य-पाद्य आदि उपचारोंद्वारा उनकी पूजा सम्पन्न की। भाई बलरामके परम धाम पधारनेके पश्चात् सम्पूर्ण गतियोंको जाननेवाले दिव्यदर्शी भगवान् श्रीकृष्ण कुछ सोचते- विचारते हुए उस सूने वनमें विचरने लगे। फिर वे श्रेष्ठ तेजवाले भगवान् पृथ्वीपर बैठ गये। सबसे पहले उन्होंने वहाँ उस समय उन सारी बातोंको स्मरण किया, जिन्हें पूर्वकालमें गान्धारी देवीने कहा था
vane śūnye vicaraṁś cintayāno bhūmau cātha saṁviveśāgryatejāḥ | sarvaṁ tena prāktadā vittaṁ āsīd gāndhāryā yad vākyam uktaḥ sa pūrvam ||
বৈশম্পায়নে ক’লে— সেই নিৰ্জন বনত চিন্তামগ্ন হৈ বিচৰণ কৰি পৰম তেজস্বী ভগৱান ভূমিত বহিল। তেতিয়াই তেওঁ প্ৰথমে ৰাণী গান্ধাৰীয়ে পূৰ্বে তেওঁক উদ্দেশ কৰি কোৱা সকলো বাক্য সম্পূৰ্ণৰূপে স্মৰণ কৰিলে—পূৰ্বকৰ্মৰ ফল প্ৰকাশ পোৱা লগে লগে সেই বাক্যসমূহ নৈতিক গাম্ভীৰ্য লৈ পুনৰ উভতি আহিল।
वैशम्पायन उवाच