कर्णस्य एकाकि-प्रहारः तथा पाण्डव-महारथ-परिवेष्टनम् | Karṇa’s concentrated assault and the Pāṇḍava encirclement
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धाविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५६ ॥। >> श््जु अीस-न्अ - संशप्तकोंके सेनापति त्रिगर्तराज सुशर्मा कौरवोंके पक्षमें था। यह सुशर्मा उससे भिन्न पाण्डव-पक्षका योद्धा था। सप्तपञ्चाशत्तमो<्ध्याय: दुर्योधनका सैनिकोंको प्रोत्साहन देना और अश्वत्थामाकी प्रतिज्ञा संजय उवाच दुर्योधनस्तत: कर्णमुपेत्य भरतर्षभ । अब्रवीन्मद्रराजं च तथैवान्यांश्व॒ पार्थिवान्,संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर दुर्योधन कर्णके पास जाकर मद्रराज शल्य तथा अन्य राजाओंसे बोला--
sañjaya uvāca | duryodhanas tataḥ karṇam upetya bharatarṣabha | abravīn madrarājaṃ ca tathaivānyāṃś ca pārthivān ||
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ কৰ্ণপৰ্বত সংকুলযুদ্ধ-বিষয়ক ছাপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল ॥ ৫৬ ॥ সঞ্জয়ে ক’লে—হে ভৰতর্ষভ, তাৰ পিছত দুৰ্যোধন কৰ্ণৰ ওচৰলৈ গৈ মদ্ৰৰাজ শল্যক আৰু তদ্ৰূপ অন্যান্য ৰজাসকলকো সম্বোধন কৰি ক’লে।
संजय उवाच