Karna Reproves Shalya; Brahmin Reports on Bāhlīkas; Shalya’s Universalizing Rebuttal (कर्ण–शल्य संवादः)
अच्छेद्य: सर्वतो वीर वाजिनश्न मनोजवा: । ध्वजश्न दिव्यो द्युतिमान् वानरो विस्मयंकर:,सर्वलोकवन्दित, दशाहईकुलनन्दन श्रीकृष्ण उनके घोड़ोंकी रास सँभालते हैं। वीर! उनके पास अग्निका दिया हुआ सुवर्णभूषित दिव्य रथ है, जिसे किसी प्रकार नष्ट नहीं किया जा सकता। उनके घोड़े भी मनके समान वेगशाली हैं। उनका तेजस्वी ध्वज दिव्य है, जिसके ऊपर सबको आश्चर्यमें डालनेवाला वानर बैठा रहता है
acchedyaḥ sarvato vīra vājināś ca manojavāḥ | dhvajaś ca divyo dyutimān vānaro vismayaṅkaraḥ ||
কৰ্ণই ক’লে—হে বীৰ! তেওঁৰ ৰথটো চাৰিওফালে অচ্ছেদ্য; কোনো অস্ত্ৰেই তাক ধ্বংস কৰিব নোৱাৰে। তেওঁৰ অশ্বসমূহ মনৰ দৰে দ্ৰুত। তেওঁৰ ধ্বজ দীপ্তিমান আৰু দিব্য; তাত সকলোকে বিস্মিত কৰা বানৰ অধিষ্ঠিত।
कर्ण उवाच