द्रोणवध-प्रश्नः
Droṇa’s Fall: Dhṛtarāṣṭra’s Inquiry
वैडूर्यजालसंछन्नैर्वीर्यद्रविणमाश्रित: । दिव्यं विस्फाययंश्चापं द्रोणमभ्यद्रवद् बली,भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे जब युद्धमें पाण्ड्यदेशके राजा तथा वर्तमान नरेशके पिता मारे गये, पाण्ड्यराजधानीका फाटक तोड़-फोड़ दिया गया और सारे बन्धु-बान्धव भाग गये, उस समय जिसने भीष्म, द्रोण, परशुराम तथा कृपाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखकर उसमें रुकमी, कर्ण, अर्जुन और श्रीकृष्णकी समानता प्राप्त कर ली; फिर द्वारकाको नष्ट करने और सारी पृथ्वीपर विजय पानेका संकल्प किया; यह देख विद्वान् सुहृदोंने हितकी कामना रखकर जिसे वैसा दुःसाहस करनेसे रोक दिया और अब जो वैरभाव छोड़कर अपने राज्यका शासन कर रहा है और जिसके रथपर सागरके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती है, पराक्रमरूपी धनका आश्रय लेनेवाले उस बलवान राजा पाण्ड्यने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करते हुए वैदूर्यमणिकी जालीसे आच्छादित तथा चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा द्रोणाचार्यपर धावा किया
vaiḍūryajālasaṃchannair vīryadraviṇam āśritaḥ | divyaṃ visphāyayaṃś cāpaṃ droṇam abhyadravad balī ||
সঞ্জয়ে ক’লে—বৈদূৰ্যমণিৰ জালিতে আচ্ছাদিত ৰথত, নিজৰ বীৰ্যক ধন বুলি আশ্ৰয় কৰি, সেই বলবান যোদ্ধাই দিৱ্য ধনুৰ গম্ভীৰ টংকাৰ তুলিতে তুলিতে দ্ৰোণাচাৰ্যৰ ওপৰত ধাৱমান হ’ল।
संजय उवाच
The verse underscores how, in war, even revered figures like teachers become targets under the demands of kṣatriya duty; it invites reflection on the ethical strain between reverence (guru-bhakti) and battlefield obligation (raṇa-dharma).
Sañjaya describes a powerful warrior rushing straight at Droṇa, in a richly adorned chariot, loudly twanging his divine bow as a signal of challenge and imminent combat.