Adhyāya 74 (Book 6, Bhīṣma-parva): Bhīma–Duryodhana re-engagement and afternoon escalation
बहुवर्ण विचित्र च दिव्यं वानरलक्षणम् । अपश्याम महाराज ध्वजं गाण्डीवधन्चन:,महाराज! अर्जुनका ध्वज सिंहपुच्छके समान वानरकी पूँछसे युक्त था। वह प्रज्वलित पर्वत-सा दिखायी देता था। वृक्षोंमें कहीं भी अटकता नहीं था। आकाशमें उदित हुए धूमकेतु-सा दृष्टिगोचर होता था। वह अनेक रंगोंसे सुशोभित, विचित्र, दिव्य एवं वानर- चिह्से युक्त था। इस प्रकार हमने गाण्डीवधारी अर्जुके उस ध्वजको उस समय देखा
sañjaya uvāca |
bahuvarṇa-vicitraṃ ca divyaṃ vānara-lakṣaṇam |
apaśyāma mahārāja dhvajaṃ gāṇḍīva-dhanvanaḥ ||
মহাৰাজ! আমি গাণ্ডীৱধাৰী অৰ্জুনৰ ধ্বজ দেখিলোঁ—বহুবৰ্ণে শোভিত, বিচিত্ৰ, দিব্য আৰু বানৰ-চিহ্নযুক্ত।
संजय उवाच