Adhyāya 41 — Yudhiṣṭhira’s Gurv-anumati and Strategic Counsel (युधिष्ठिरस्य गुर्वनुमतिः)
सम्बन्ध-- सत्त्त., रज और तम--इन तीनों गुणोंकी वृद्धियें मरनेके भित्न- भिन्न फल बतलाये गये: इससे यह जाननेकी इच्छा होती है कि इस प्रकार कभी किसी गुणकी और कभी किसी गुणकी वृद्धि क्यों होती है; इसपर कहते हैं-- कर्मण:” सुकृतस्याहुः साच्विकं निर्मल फलम् । रजसस्तु फल॑ दुःखमज्ञानं तमस: फलम्,श्रेष्ठ कर्मका तो सात्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है।* राजस कर्मका फल दुःख* एवं तामस कर्मका फल अज्ञान* कहा है
karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam | rajasas tu phalaṁ duḥkham ajñānaṁ tamasaḥ phalam ||
কোৱা হয়, সুকৃত কৰ্মৰ ফল সত্ত্বিক—নিৰ্মল; ৰজসৰ ফল দুঃখ, আৰু তমসৰ ফল অজ্ঞান।
अजुन उवाच