अक्षरब्रह्मयोग (Akṣara-Brahma-Yoga) — Knowledge of the Imperishable, Prakṛti, and Devotion
प्रलपन् विसृजन गृह्नन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्,तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी5ः तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोमें बरत रही हैं--इस प्रकार समझकर नि:संदेह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ:
pralapan visṛjan gṛhṇan unmiṣan nimiṣann api | indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||
কথা কোৱা, ত্যাগ কৰা, গ্ৰহণ কৰা আৰু চকু মেলি-বন্ধ কৰা অৱস্থাতো—“ইন্দ্ৰিয়সমূহেই ইন্দ্ৰিয়বিষয়ত চলিছে” এই বোধ দৃঢ় কৰি তত্ত্বজ্ঞানী নিজকে অকর্তা ভাবে।
अर्जुन उवाच