Uttanka’s Guru-Śuśrūṣā and the Commission to Retrieve the Maṇikuṇḍalas (उत्तङ्क-गुरुशुश्रूषा तथा मणिकुण्डल-आदेशः)
उत्तड़्क उवाच (नमो नमस्ते सर्वात्मन् नारायण परात्पर । परमात्मन् पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ।। उत्तंक बोले--सर्वात्मन्! परात्पर नारायण! आपको बारंबार नमस्कार है। परमात्मन्! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार है ।। हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च । पुरुषाय पुराणाय चान्तर्यामाय ते नमः ।। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। आप संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं। आप ही अन्तर्यामी पुराण-पुरुष हैं। आपको नमस्कार है ।। अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम् | संसारार्णवपारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ।। आप अविद्यारूपी अन्धकारको मिटानेवाले सूर्य, संसाररूपी रोगके महान् औषध तथा भवसागरसे पार करनेवाले हैं। आपको प्रणाम करता हूँ। आप मेरे आश्रय-दाता हों ।। सर्ववेदैकवेद्याय सर्वदेवमयाय च । वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ।। आप सम्पूर्ण वेदोंके एकमात्र वेद्यतत्त्व हैं। सम्पूर्ण देवता आपके ही स्वरूप हैं तथा आप भक्तजनोंको अत्यन्त प्रिय हैं। आप नित्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है ।। दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहाहसि । कर्मभिर्बहुभि: पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन ।।) जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोहसे मेरा उद्धार करें। मैं बहुत-से पाप-कर्माद्वारा बँधा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें ।। विश्वकर्मन् नमस्ते<स्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । पदभ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभ:,विश्वकर्मन! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत विश्वात्मन! आपके दोनों पैरोंसे पृथ्वी और सिरसे आकाश व्याप्त है
uttaṅka uvāca |
viśvakarman namas te 'stu viśvātman viśvasambhava |
padabhyāṁ te pṛthivī vyāptā śirasā cāvṛtaṁ nabhaḥ ||
উত্তঙ্ক ক’লে— “সৰ্বাত্মন্, পৰাত্পৰ নাৰায়ণ, আপোনাক বাৰে বাৰে নমস্কাৰ। পৰমাত্মন্, পদ্মনাভ, পুণ্ডৰীকাক্ষ, মাধৱ—আপোনাক নমস্কাৰ। হিৰণ্যগৰ্ভ-ৰূপ, সংসাৰ পাৰ কৰোৱা, পুৰাণ-পুরুষ, অন্তৰ্যামী—আপোনাক নমস্কাৰ। আপুনি অবিদ্যা-অন্ধকাৰ নাশ কৰা সূৰ্য, ভব-ৰোগৰ মহৌষধি, আৰু সংসাৰ-সমুদ্ৰ পাৰ কৰোৱা গতি; হে গতিদাতা, মই আপোনাক প্ৰণাম কৰোঁ। আপুনি সকলো বেদৰ একমাত্ৰ বেদ্য তত্ত্ব; সকলো দেৱতা আপোনাৰেই স্বৰূপ; নিত্য বাসুদেৱ, ভক্তপ্ৰিয়—আপোনাক নমস্কাৰ। জনাৰ্দন! দয়াৰে দুঃখজনিত মোহৰ পৰা মোক উদ্ধাৰ কৰক; মই বহু পাপকর্মেৰে বন্ধিত—মোক ৰক্ষা কৰক। হে বিশ্বকৰ্মন্! আপোনাক নমস্কাৰ—হে বিশ্বাত্মন্, বিশ্বসম্ভৱ! আপোনাৰ পদদ্বয়ে পৃথিৱী ব্যাপ্ত, আৰু আপোনাৰ শিৰে আকাশ আৱৃত।”
उत्तड़्क उवाच
The verse teaches a vision of the divine as both transcendent and all-pervading: the creator is not separate from the cosmos but encompasses it—earth and sky are described as contained within the divine body, encouraging reverence and humility.
In Aśvamedhika Parva, Uttaṅka offers a hymn of praise. Here he addresses the deity as Viśvakarman, acknowledging the deity as the universe’s source and describing a cosmic, all-encompassing form.