Vāsudeva’s Upadeśa: The Inner Enemy and the Indra–Vṛtra Precedent (आत्मशत्रु-बोधः; इन्द्र-वृत्रोपाख्यानम्)
निर्विण्णमनसं पार्थ ज्ञात्वा वृष्णिकुलोदह: | आश्वासयन् धर्मसुतं प्रवक्तुमुपचक्रमे,जाति-भाइयोंके मारे जानेसे युधिष्ठिरका मन शोकसे दीन एवं व्याकुल हो रहा था। वे राहुग्रस्त सूर्य और धूमयुक्त अग्निके समान निस्तेज हो गये थे। विशेषतः उनका मन राज्यकी ओरसे खिन्न एवं विरक्त हो गया था। यह सब जानकर वृष्णिवंशभूषण श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार धर्मपुत्र युधिष्ठिको आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया
vaiśampāyana uvāca | nirviṇṇamanasaṃ pārtha jñātvā vṛṣṇikulodvahaḥ | āśvāsayan dharmasutaṃ pravaktum upacakrame ||
বৈশম্পায়নে ক’লে— পার্থ যুধিষ্ঠিৰৰ মন নিৰ্বেদে ভৰা, শোকে ক্ষীণ আৰু বিশেষকৈ ৰাজ্যভাৰৰ প্ৰতি বিরক্ত হোৱা জানি বৃষ্ণিকুলশ্ৰেষ্ঠ শ্ৰীকৃষ্ণে ধৰ্মসুতক আশ্বাস দি কথা আৰম্ভ কৰিলে।
वैशम्पायन उवाच