Āśvamedhika-parva Adhyāya 1 — Yudhiṣṭhira’s Lament by the Gaṅgā and Dhṛtarāṣṭra’s Counsel
अनुशासनपर्वकी कुल श्लोकसंख्या-- ९८१० ॥|* नशा (0) आस अस न ॥ ३० श्रीपरमात्मने नम: ।। श्रीमहाभारतम् आश्वमेधिकपर्व अश्वमेधपर्व प्रथमो 5 ध्याय: युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्,अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि प्रथमो5ध्याय:
vaiśampāyana uvāca | nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam | devīṁ sarasvatīṁ caiva tato jayam udīrayet ||
বৈশম্পায়নে ক’লে—নাৰায়ণক, নৰশ্ৰেষ্ঠ নৰক আৰু দেৱী সৰস্বতীক নমস্কাৰ কৰি, তাৰ পাছত ‘জয়’ (মহাভাৰত) পাঠ কৰা উচিত।
वैशम्पायन उवाच