धृतराष्ट्रस्य वनप्रस्थानानुज्ञा | Permission for Dhṛtarāṣṭra’s Forest-Retirement
भवन्तो>5प्यनुजानन्तु मा च वो5भूदू विचारणा,“अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें। इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम-सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है कृते याचेडद्य व: सर्वान् गान्धारीसहितो5नघा: । निष्पाप प्रजाजन! मेरे पुत्रोंकी बुद्धि चंचल थी। वे लोभी और स्वेच्छाचारी थे। उनके अपराधोंके लिये आज गान्धारीसहित मैं आप सब लोगोंसे क्षमा-याचना करता हूँ ।। १७४६ || इत्युक्तास्तेन ते सर्वे पौरजानपदा जना: । नोचुर्बाष्पकला: किंचिद् वीक्षांचक्रु: परस्परम् धृतराष्ट्रके इस प्रकार कहनेपर नगर और जनपदमें निवास करनेवाले सब लोग नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए एक-दूसरेका मुँह देखने लगे। किसीने कोई उत्तर नहीं दिया
vaiśampāyana uvāca | ity uktās tena te sarve paurajānapadā janāḥ | nocur bāṣpakalāḥ kiñcid vīkṣāṃ cakruḥ parasparam ||
“আপোনালোকেও মোক অনুমতি দিয়ক; আৰু এই বিষয়ত আপোনালোকৰ মনত কোনো বিপৰীত ভাবনা নুঠক। হে নিষ্পাপ জনসাধাৰণ! আজি মই গান্ধাৰীৰ সৈতে আপোনালোক সকলোৰে ওচৰত ক্ষমা যাচনা কৰিছোঁ।” এইদৰে কোৱাৰ পাছত নগৰ আৰু জনপদৰ সকলো লোক চকুপানীৰে ভৰি পৰি পৰস্পৰৰ মুখলৈ চাই ৰ’ল; কোনেও একো উত্তৰ নক’লে।
वैशम्पायन उवाच