
Śrāddha-pravṛtti-kathana and Varjya-dravya-nirdeśa (Origin and Prohibitions in Śrāddha)
Upa-parva: Śrāddha-vidhi (Pitṛyajña) Anuśāsana
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma about the origin, timing, nature, and exclusions of śrāddha, including which roots, fruits, and grains are to be avoided. Bhīṣma replies with an etiological account: from Svāyambhuva Atri’s lineage comes Dattātreya; from him Nimi; Nimi’s son Śrīmān dies after severe tapas, and Nimi, overwhelmed by grief, performs śauca and then reflects on a śrāddha procedure. On amāvāsyā he invites and honors brāhmaṇas, prepares right-turning seats, offers a saltless śyāmāka-based meal, places darbha with southern tips, and gives piṇḍa while uttering name and gotra. Concerned he has done something unprecedented, he invokes Atri, who consoles him: the pitṛyajña is sanctioned by Brahmā/Svayaṃbhu and will be taught in an ‘uttama’ form. Atri outlines key invocations (Agni, Aryaman, Soma, Varuṇa, Viśvedevāḥ) and frames the pitṛ-deities as Svayaṃbhu-created, with allotted shares. The chapter then enumerates Viśvedevā names and provides a detailed list of items and conditions to avoid in śrāddha—specific grains, pungent substances and vegetables (notably onion/garlic), certain meats and unpurified foods, sprouts, particular fruits (e.g., jambū), and the presence of censured persons or disruptions—stating that such offerings are not approved by pitṛs and devas. Atri departs after delivering the guidance.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का जिज्ञासु प्रश्न उठता है—श्राद्ध में ऐसा क्या दिया जाए जो पितरों के लिए ‘अक्षय’ तृप्ति बन जाए, और किस हवि का फल सबसे दीर्घकालिक है? → भीष्म श्राद्ध-कल्प के ‘काम्य’ हविष्यों की सूची और उनके फल बताने लगते हैं—गव्य (दूध-दही), सर्पिषा-युक्त पायस, विशेष तिथियाँ-नक्षत्र (त्रयोदशी, मघा), और विधि-विधान (हाथी की छाया, कर्णव्यजन से वायु) जैसे सूक्ष्म नियमों के साथ; साधारण दान और विधिपूर्वक दान के फल में अंतर उभरता जाता है। → पितरों की वाणी-सा भाव प्रकट होता है—‘क्या हमारे कुल में कोई ऐसा जन्मेगा जो दक्षिणायन में त्रयोदशी को घृत-युक्त पायस दे?’—यहीं अध्याय का शिखर है, जहाँ श्राद्ध का कर्म केवल दान नहीं, वंश-धर्म और स्मृति-ऋण का आह्वान बन जाता है। → भीष्म निष्कर्ष रूप में बताते हैं कि पितृ-क्षय तिथि पर जल, मूल, फल, अन्न, मांस आदि—विशेषतः मधु-सम्मिश्र—जो भी श्रद्धा से अर्पित हो, वह ‘अनन्त्य’ (दीर्घ/अक्षय) फल की ओर ले जाता है; साथ ही गया-यात्रा और अक्षय-वट की महिमा से ‘अक्षय’ तृप्ति का मार्ग दृढ़ होता है। → युधिष्ठिर की जिज्ञासा अगले प्रसंग की ओर संकेत करती है—इन दानों/तिथियों में कौन-सा विधान सर्वश्रेष्ठ है और किन परिस्थितियों में कौन-सा विकल्प ग्राह्य है?
Verse 1
ऑपन--माजल छा अि<-छऋाज अष्टाशीतितमो<् ध्याय: श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन युधिछिर उवाच किंस्विद् दत्तं पितृभ्यो वै भवत्यक्षयमी श्वर । कि हविदश्विररात्राय किमानन्त्याय कल्पते,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! पितरोंके लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तुके दानसे पितर अधिक दिनतक और किसके दानसे अनन्त कालतक तृप्त रहते हैं?
যুধিষ্ঠিৰে সুধিলে—“পিতামহ! পিতৃসকলৰ উদ্দেশে দিয়া কোন দান অক্ষয় হয়? কোন দানত তেওঁলোক দীঘলীয়া সময়লৈ তৃপ্ত থাকে, আৰু কোন দানত অনন্তকাললৈ তৃপ্ত থাকে?”
Verse 2
भीष्म उवाच हवींषि श्राद्धकल्पे तु यानि श्राद्धविदो विदु: । तानि मे शृणु काम्यानि फलं चैव युधिष्ठिर
ভীষ্মে ক’লে—“যুধিষ্ঠিৰ! শ্ৰাদ্ধবিধিৰ জ্ঞানীসকলে শ্ৰাদ্ধকল্পত যি যি হৱিষ্য বিধিসম্মত বুলি জানে, সেয়া মোৰ পৰা শুনা। সেয়া কাম্য; আৰু তাৰ ফলও শুনা।”
Verse 3
भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओंने श्राद्ध-कल्पमें जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फलका वर्णन करता हूँ, सुनो ।। तिलैब्रीहियवैर्माषैरद्भि्मूलफलैस्तथा । दत्तेन मासं प्रीयन्ते श्राद्धेन पितरो नृप,नरेश्वर! तिल, ब्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करनेसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है
ভীষ্মে ক’লে—“যুধিষ্ঠিৰ! শ্ৰাদ্ধবেত্তাসকলে শ্ৰাদ্ধকল্পত যি হৱিষ্য নিৰ্ধাৰণ কৰিছে, সেয়া সকলো কাম্যফলপ্ৰদ; মই তাৰ ফল কওঁ—শুনা। হে নৰেশ্বৰ! তিল, ব্ৰীহি (চাউল), যৱ, মাষ (উড়দ), জল আৰু মূল-ফলৰে শ্ৰাদ্ধ কৰিলে পিতৃসকল এক মাহলৈ তৃপ্ত থাকে।”
Verse 4
वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षयं मनुरब्रवीत् | सर्वेष्वेव तु भोज्येषु तिला: प्राधान्यत: स्मृता:,मनुजीका कथन है कि जिस श्राद्धमें तिलकी मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य-पदार्थोंमें तिलोंका प्रधानरूपसे उपयोग बताया गया है
মনুৱে কৈছে—যি শ্ৰাদ্ধত তিল অধিক থাকে, সেই শ্ৰাদ্ধ অক্ষয়ফলপ্ৰদ। শ্ৰাদ্ধ-সম্পৰ্কীয় সকলো ভোজ্যদ্ৰব্যৰ ভিতৰত তিলকেই প্ৰধান বুলি স্মৃতিত কোৱা হৈছে।
Verse 5
गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्यते । यथा गव्यं तथा युक्त पायसं सर्पिषा सह,यदि श्राद्धमें गायका दही दान किया जाय तो उससे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति होती बतायी गयी है। गायके दहीका जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृतमिश्रित खीरका भी समझना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—শ্ৰাদ্ধত গাইৰ পৰা উৎপন্ন দ্ৰব্য দান কৰিলে পিতৃসকল এক বছৰ পৰ্যন্ত তৃপ্ত হয়—এয়া ইয়াত কোৱা হৈছে। আৰু গব্যৰ যি ফল কোৱা হৈছে, সেই একে ফল ঘৃত-মিশ্ৰিত পায়স (খীৰ)ৰ ক্ষেত্ৰতো বুজিব লাগে।
Verse 6
गाथाश्षचाप्यत्र गायन्ति पितृगीता युधिष्ठिर । सनत्कुमारो भगवान् पुरा मय्यभ्यभाषत,युधिष्ठिर! इस विषयमें पितरोंद्वारा गायी हुई गाथाका भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं। पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने मुझे यह गाथा बतायी थी
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ, এই বিষয়ত পিতৃসকলে গোৱা গাথা জ্ঞানীসকলেও গায়। প্ৰাচীন কালে ভগৱান সনৎকুমাৰে মোক এই একে গাথা কৈছিল।
Verse 7
अपि न: स्वकुले जायाद् यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् । मवासु सर्पि:संयुक्त पायसं दक्षिणायने,पितर कहते हैं--“क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायनमें आश्चिन मासके कृष्णपक्षमें मघा और त्रयोदशी तिथिका योग होनेपर हमारे लिये घृतमिश्रित खीरका दान करेगा?
ভীষ্মে ক’লে—পিতৃসকলে এইদৰে আকাংক্ষা কৰে: “আমাৰ কুলত কোনোবা জন্মিব নে, যিয়ে ত্ৰয়োদশীৰ বিধি আমাৰ উদ্দেশে সম্পন্ন কৰিব—দক্ষিণায়নত, যথোচিত কাল-যোগ হ’লে, ঘৃত-মিশ্ৰিত পায়স দান কৰি?”
Verse 8
आजेन वापि लौहेन मघास्वेव यतव्रत: । हस्तिच्छायासु विधिवत् कर्णव्यजनवीजितम्,“अथवा वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करके मघा नक्षत्रमें ही हाथीके शरीरकी छायामें बैठकर उसके कानरूपी व्यजनसे हवा लेता हुआ अन्न-विशेष-चावलका बना हुआ पायस या लौहशाकसे विधिपूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा?
ভীষ্মে ক’লে—“নচেৎ তেওঁ নিয়মনিষ্ঠাৰে ব্ৰত পালন কৰি মঘা নক্ষত্ৰতেই, হাতীৰ ছাঁত বহি, হাতীৰ কৰ্ণক যেন ব্যজন কৰি বতাহ পাই, বিধিপূৰ্বক আমাৰ শ্ৰাদ্ধ সম্পন্ন কৰক—আৰু চাউলৰ পায়স বা লৌহ-শাক নিবেদন কৰক।”
Verse 9
एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येको5पि गयां व्रजेत् । यत्रासौ प्रथितो लोकेष्वक्षय्यकरणो वट:,“बहुत-से पुत्र पानेकी अभिलाषा रखनी चाहिये, उनमेंसे यदि एक भी उस गया-तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात अक्षयवट विद्यमान है, जो श्राद्धके फलको अक्षय बनानेवाला है
ভীষ্মে ক’লে—বহু পুত্ৰৰ কামনা কৰা উচিত; কিয়নো তেওঁলোকৰ মাজৰ এজনেও যদি গয়া-তীৰ্থলৈ যায়—য’ত লোকপ্ৰসিদ্ধ অক্ষয়বট আছে, যিয়ে শ্ৰাদ্ধৰ ফল অক্ষয় কৰে—তেন্তে পিতৃসকলৰ স্থায়ী কল্যাণ সাধিত হয়।
Verse 10
आपो मूलं फलं॑ मांसमन्नं वापि पितृक्षये । यत् किंचिन्मधुसम्मिश्र॑ तदानन्त्याय कल्पते,'पितरोंकी क्षय-तिथिको जल, मूल, फल, उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधुमिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्तकालतक तृप्ति देनेवाला है”
পিতৃক্ষয়-তিথিত জল, মূল, ফল, মাংস বা অন্ন—যি কোনো বস্তু মধুৰ সৈতে মিহলাই অৰ্পণ কৰা হয়, সেয়া পিতৃসকলক অনন্তকাল তৃপ্তি দান কৰে।
Verse 87
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত, শ্ৰাদ্ধকল্প-বিষয়ক সাতাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 88
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानथधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पेडष्टाशीतितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धकल्पविषयक अद्डासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত, শ্ৰাদ্ধকল্প-বিষয়ক আঠাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Nimi’s dilemma is whether instituting a new ritual response to grief risks dharma-saṃkara (normative confusion) and social sanction; Atri resolves it by grounding the rite in Svayaṃbhu/Brahmā’s prior authorization.
Grief is disciplined through duty: ancestral rites are framed as a sanctioned pathway that converts personal loss into structured obligation, emphasizing correctness of intention, procedure, and purity constraints.
A formal phalaśruti is not foregrounded; instead, the meta-claim is ritual efficacy through legitimacy—Atri states the pitṛyajña is Svayaṃbhu-ordained, and improper offerings are described as not accepted by pitṛs and devas, implying loss of intended merit.