Adhyaya 86
Anushasana ParvaAdhyaya 8658 Verses

Adhyaya 86

Suvarṇa-dāna: Kārttikeya’s Origin and the Defeat of Tāraka (सुवर्णदान-प्रसङ्गे कार्त्तिकेय-उत्पत्ति तथा तारकवधः)

Upa-parva: Dāna-dharma (Suvarṇa-dāna and the Kārttikeya–Tāraka exemplum)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to restate, with full detail, how the dānava Tāraka—earlier characterized as difficult to overcome—ultimately attains death, and how this relates to the previously stated rationale for suvarṇa’s origin and merit in gifting. Bhīṣma recounts that, when the devas and ṛṣis face crisis, the Kṛttikās are urged toward a protective maternal role. Agni’s potent tejas is borne by six Kṛttikās, who, unable to find ease due to its intensity, deliver the embryo together; the sixfold locus becomes unified and is received by the Earth near Kāntīpura, then grows in a divine śaravaṇa (reed-bed). The child is identified as Kārttikeya/Skanda/Guha, described with multiple faces and arms, and is celebrated by devas, ṛṣis, and gandharvas. Various beings offer emblems and companions (including the peacock and other gifts), establishing his martial and royal iconography. As Skanda matures, Tāraka attempts various means to overcome him but fails; the devas appoint Skanda as senāpati, and he kills Tāraka with an unfailing śakti, restoring Indra’s sovereignty. The chapter concludes by linking suvarṇa’s auspiciousness to Kārttikeya’s innate association with Agni’s brilliance, and by citing a precedent (Vasiṣṭha’s narration to Rāma) where suvarṇa-dāna leads to purification and an elevated celestial attainment.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को गोदान की महिमा का द्वार खोलते हैं—यज्ञ का प्राण दधि-घृत है और उसका मूल गौ है; अतः समस्त दानों में गोदान सर्वोपरि है। → वर्णन क्रमशः लौकिक उपयोग से दैवी उत्कर्ष की ओर चढ़ता है: गौएँ पयस् और हवि से प्रजा का धारण करती हैं, उनके पुत्र (बैल) कृषि का आधार हैं, और इसी से अन्न-बीज की उत्पत्ति तथा समाज-धर्म का प्रवाह चलता है; फिर भीष्म इन्द्र को संबोधित ब्रह्मा-कथन के माध्यम से गोलोक और सुरभि-गौओं के दिव्य लोक का विस्तार करते हैं। → गोलोक का चरम चित्र उभरता है—सहस्राक्ष इन्द्र के लिए वह लोक ‘सर्वकामसमन्वित’ है, जहाँ मृत्यु, जरा और दाह का प्रवेश नहीं; दिव्य वन-भवन और इच्छानुसार चलने वाले विमान हैं, और वहाँ अशुभ-दुर्भाग्य का नाम नहीं। → भीष्म निष्कर्ष बाँधते हैं कि विविध दान, तीर्थसेवन, तप, इन्द्रियसंयम और पुण्यकर्म से गोलोक की प्राप्ति संभव है; पर इन सबमें गोसेवा-गोदान का विशेष प्रशस्त्य है क्योंकि वही यज्ञ, अन्न और जीवन-धारण की जड़ है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-आक्षात बछ। अं क्ाज तग्रय्शीतितमो<ध्याय: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना भीष्म उवाच येचगां सम्प्रयच्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्न ये । तेषां सत्राणि यज्ञाश्न नित्यमेव युधिष्ठिर,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! जो मनुष्य सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन और गोदान करते हैं उन्हें प्रतेदिन अन्नदान और यज्ञ करनेका फल मिलता है

ভীষ্মে ক’লে—“যুধিষ্ঠিৰ! যিসকল মানুহে সদায় গোদান কৰে আৰু যজ্ঞত অৰ্পিত আহুতিৰ অৱশিষ্ট অন্ন ভক্ষণ কৰে, তেওঁলোকে নিত্য সত্রযজ্ঞ আৰু যজ্ঞকর্মৰ ফল লাভ কৰে। তেওঁলোকৰ দৈনন্দিন আচৰণেই যেন অবিৰাম যজ্ঞ হৈ পৰে।”

Verse 2

ऋते दधि घृतेनेह न यज्ञ: सम्प्रवर्तते । तेन यज्ञस्य यज्ञत्वमतो मूलं च कथ्यते,दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता। उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है। अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं

“দধি আৰু ঘৃত নাথাকিলে এই লোকত যজ্ঞ সঠিকভাৱে চলি নাযায়। এই দুয়োটাৰ দ্বাৰাই যজ্ঞৰ ‘যজ্ঞত্ব’ সম্পূৰ্ণ হয়; সেয়ে (গো-উৎপন্ন দ্ৰব্যৰ কাৰণে) গাভীক যজ্ঞৰ মূল বুলি কোৱা হয়।”

Verse 3

दानानामपि सर्वेषां गवां दान प्रशस्यते । गाव: श्रेष्ठा: पवित्राश्न॒ पावन होतदुत्तमम्‌,सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं

“সকলো দানৰ ভিতৰত গোদান বিশেষভাৱে প্ৰশংসিত। সেয়ে গাভীক শ্ৰেষ্ঠ আৰু পবিত্ৰ বুলি গণ্য কৰা হয়; আৰু গোদানক পৰম পাৱনকাৰী তথা উত্তম দান বুলি কোৱা হয়।”

Verse 4

पुष्ट्यर्थमेता: सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह | पयोदधिघृतं चासां सर्वपापप्रमोचनम्‌,मनुष्यको अपने शरीरकी पुष्टि तथा सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये भी गौओंका सेवन करना चाहिये। इनके दूध, दही और घी सब पापोंसे छुड़ानेवाले हैं

“দেহৰ পুষ্টিৰ বাবে আৰু সকলো ধৰণৰ বিঘ্ন-উপদ্ৰৱৰ শান্তিৰ বাবেও এই গাভীসকলৰ সেৱা কৰা উচিত। তেওঁলোকৰ গাখীৰ, দধি আৰু ঘৃতক সৰ্বপাপ-প্ৰমোচক বুলি কোৱা হয়।”

Verse 5

गावस्तेज: परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च । न गोभ्य: परमं किंचित्‌ पवित्र भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान्‌ तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है

ভীষ্মে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! গোৱালৈ ইহলোক আৰু পৰলোক—দুয়োতে পৰম তেজ বুলি ঘোষণা কৰা হৈছে। গোৱাতকৈ অধিক পবিত্ৰ একোৱেই নাই।

Verse 6

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । पितामहस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान्‌ पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! এই বিষয়তো পণ্ডিতসকলে এক প্ৰাচীন ইতিবৃত্তৰ দৃষ্টান্ত দিয়ে—পিতামহ (ব্ৰহ্মা) আৰু ইন্দ্ৰৰ সংলাপ।

Verse 7

पराभूतेषु दैत्येषु शक्रस्त्रिभुवने श्वर: । प्रजा: समुदिता: सर्वा: सत्यधर्मपरायणा:,पूर्वकालमें देवताओंद्वारा दैत्योंके परास्त हो जानेपर जब इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर हुए तब समस्त प्रजा मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ सत्य और धर्ममें तत्पर रहने लगी

ভীষ্মে ক’লে—পূৰ্বকালত দেৱতাসকলে দৈত্যসকলক পৰাভূত কৰাৰ পিছত শক্ৰ (ইন্দ্ৰ) ত্ৰিভুবনৰ অধীশ্বৰ হ’ল। তেতিয়া সকলো প্ৰজা একত্ৰ হৈ আনন্দিত হৈ সত্য আৰু ধৰ্মত পৰায়ণ হ’ল।

Verse 8

अथर्षय: सगन्धर्वा: किन्नरोरगराक्षसा: । देवासुरसुपर्णाश्न प्रजानां पतयस्तथा,कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूृहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्‍न्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्‌ू-पृथक्‌ ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा---

ভীষ্মে ক’লে—হে কুন্তীনন্দন! তেতিয়া ঋষিসকল, গন্ধৰ্বসকল, কিন্নৰ, নাগ, ৰাক্ষস, দেৱ, অসুৰ, সুপৰ্ণ (গৰুড়-জাতি) আৰু প্ৰজাৰ অধিপতি প্ৰজাপতিসকল—সকলো তাত উপস্থিত আছিল।

Verse 9

पर्युपासन्त कौन्तेय कदाचिद्‌ वै पितामहम्‌ । नारद: पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहू:,कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूृहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्‍न्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्‌ू-पृथक्‌ ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा---

ভীষ্মে ক’লে—হে কৌন্তেয়! এবাৰ তেওঁলোক পিতামহ (ব্ৰহ্মা)ৰ সেবাত উপস্থিত আছিল। নাৰদ আৰু পৰ্বত, আৰু বিশ্বাৱসু, হাহা, হূহূ নামৰ গন্ধৰ্বসকলে দিৱ্য গীতেৰে তেওঁৰ উপাসনা কৰিছিল।

Verse 10

दिव्यतानेषु गायन्त: पर्युपासन्त त॑ प्रभुम्‌ तत्र दिव्यानि पुष्पाणि प्रावहत्‌ पवनस्तदा,कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूृहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्‍न्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्‌ू-पृथक्‌ ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा---

ভীষ্মে ক’লে—দিব্য তানত গাই তেওঁলোকে সেই প্ৰভুৰ উপাসনা কৰিছিল। সেই সময়ত বায়ুদেৱে তাত দিব্য পুষ্প বোৱাই আনিছিল।

Verse 11

आजहुर्ऋतवश्चापि सुगन्धीनि पृथक्‌ पृथक्‌ । तस्मिन्‌ देवसमावाये सर्वभूतसमागमे,कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूृहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्‍न्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्‌ू-पृथक्‌ ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा---

ভীষ্মে ক’লে—ঋতুবোৰেও পৃথক পৃথকভাৱে সুগন্ধি উপহাৰ আগবঢ়াইছিল। সেই দেৱসমাৱেশত, য’ত সকলো ভূতৰ সমাগম হৈছিল।

Verse 12

दिव्यवादित्रसंघुष्टे दिव्यस्त्रीचारणावृते । इन्द्र: पप्रच्छ देवेशमभिवाद्य प्रणम्य च,कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूृहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्‍न्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्‌ू-पृथक्‌ ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा---

ভীষ্মে ক’লে—দিব্য বাদ্যৰ ধ্বনিত মুখৰ আৰু দিব্য নাৰীসকল আৰু চাৰণসকলৰ দ্বাৰা আৱৃত সেই সভাত ইন্দ্ৰই দেৱেশ্বৰক অভিবাদন কৰি প্ৰণাম কৰি প্ৰশ্ন কৰিলে।

Verse 13

देवानां भगवन्‌ कस्माल्लोकेशानां पितामह । उपरिष्टाद्‌ गवां लोक एतदिच्छामि वेदितुम्‌

ভীষ্মে ক’লে—হে ভগৱান, হে লোক আৰু দেৱসকলৰ পিতামহ! গৰুৰ লোক কিয় সৰ্বোচ্চত স্থাপিত? এই কথা মই জানিব বিচাৰোঁ।

Verse 14

“भगवन्‌! पितामह! गोलोक समस्त देवताओं और लोकपालोंके ऊपर क्‍यों है? मैं इसे जानना चाहता हूँ ।। कि तपो ब्रह्म॒चर्य वा गोभि: कृतमिहेश्वर | देवानामुपरिष्टाद्‌ यद्‌ वसन्त्यरजस: सुखम्‌,'प्रभो! गौओंने यहाँ किस तपस्याका अनुष्ठान अथवा ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जिससे वे रजोगुणसे रहित होकर देवताओंसे भी ऊपर स्थानमें सुखपूर्वक निवास करती हैं?

ভীষ্মে ক’লে—হে ভগৱান, হে পিতামহ! গ’লোক কিয় সকলো দেৱতা আৰু লোকপালসকলৰো ওপৰত অৱস্থিত? মই এই কথা জানিব বিচাৰোঁ। হে প্ৰভু! গৰুবোৰে ইয়াত কোন তপস্যা বা ব্রহ্মচৰ্য পালন কৰিছিল, যাৰ ফলত তেওঁলোকে ৰজোগুণৰ ধূলিৰ পৰা মুক্ত হৈ দেৱতাসকলৰো ওপৰৰ স্থানে সুখে বাস কৰে?

Verse 15

ततः प्रोवाच ब्रह्मा तं शक्रं बलनिषूदनम्‌ । अवज्ञातास्त्वया नित्यं गावो बलनिषूदन,तब ब्रह्माजीने बलसूदन इन्द्रसे कहा--“बलासुरका विनाश करनेवाले देवेन्द्र! तुमने सदा गौओंकी अवहेलना की है। प्रभो! इसीलिये तुम इनका माहात्म्य नहीं जानते। सुरश्रेष्ठ! गौओंका महान्‌ प्रभाव और माहात्म्य मैं बताता हूँ, सुनो

তেতিয়া ব্ৰহ্মাই বলনিষূদন শক্ৰ (ইন্দ্ৰ)ক ক’লে— “হে বলনিষূদন! তুমি সদায় গাভীক অৱজ্ঞা কৰি আহিছা; সেয়েহে তুমি তেওঁলোকৰ মাহাত্ম্য যথাৰ্থকৈ নাজানা। দেৱশ্ৰেষ্ঠ! শুনা—গাভীৰ মহান প্ৰভাৱ আৰু পবিত্ৰ মহিমা মই বৰ্ণনা কৰোঁ।”

Verse 16

तेन त्वमासां माहात्म्यं वेत्सि शृणु यत्‌ प्रभो । गवां प्रभाव परमं माहात्म्यं च सुरर्षभ,तब ब्रह्माजीने बलसूदन इन्द्रसे कहा--“बलासुरका विनाश करनेवाले देवेन्द्र! तुमने सदा गौओंकी अवहेलना की है। प्रभो! इसीलिये तुम इनका माहात्म्य नहीं जानते। सुरश्रेष्ठ! गौओंका महान्‌ प्रभाव और माहात्म्य मैं बताता हूँ, सुनो

সেই কাৰণেই, হে প্ৰভু, তুমি এই (গাভীসমূহৰ) মাহাত্ম্য নাজানা। শুনা, হে স্বামী! হে সুৰর্ষভ, গাভীৰ পৰম প্ৰভাৱ আৰু মাহাত্ম্য মই কওঁ।

Verse 17

यज्ञांगं कथिता गावो यज्ञ एव च वासव । एताभिश्न विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन,“वासव! गौओंको यज्ञका अंग और साक्षात्‌ यज्ञरूप बतलाया गया है; क्योंकि इनके दूध, दही और घीके बिना यज्ञ किसी तरह सम्पन्न नहीं हो सकता

হে বাসৱ! গাভীক যজ্ঞৰ অংগ—বৰং যজ্ঞ নিজেই—বুলি কোৱা হৈছে; কিয়নো তেওঁলোকৰ অবিহনে যজ্ঞ কোনোপধ্যেই চলিব নোৱাৰে।

Verse 18

धारयन्ति प्रजाश्नैव पयसा हविषा तथा । एतासां तनयाश्वापि कृषियोगमुपासते

তেওঁলোকে দুধেৰে আৰু যজ্ঞোপযোগী হৱিৰে প্ৰজাক ধাৰণ-পোষণ কৰে; আৰু তেওঁলোকৰ সন্তান (বলদ আদি)ও কৃষিযোগত নিয়োজিত থাকে।

Verse 19

ततो यज्ञा: प्रवर्तन्ते हव्यं कव्यं च सर्वश:,“उन्हींसे यज्ञ सम्पन्न होते और हव्य-कव्यका भी सर्वथा निर्वाह होता है। सुरेश्वर! इन्हीं गौओंसे दूध, दही और घी प्राप्त होते हैं। ये गौएँ बड़ी पवित्र होती हैं। बैल भूख-प्याससे पीड़ित होकर भी नाना प्रकारके बोझ ढोते रहते हैं

তেতিয়া তেওঁলোকৰ দ্বাৰাই যজ্ঞসমূহ প্ৰৱৰ্তিত হয়, আৰু হৱ্য-কৰ্ম আৰু কব্য-কৰ্ম—দুয়োটাৰেই সম্পূৰ্ণ নিৰ্বাহ হয়।

Verse 20

पयोदधिधघृतं चैव पुण्याश्चैता: सुराधिप । वहन्ति विविधान्‌ भारान्‌ क्षुत्तष्णापरिपीडिता:,“उन्हींसे यज्ञ सम्पन्न होते और हव्य-कव्यका भी सर्वथा निर्वाह होता है। सुरेश्वर! इन्हीं गौओंसे दूध, दही और घी प्राप्त होते हैं। ये गौएँ बड़ी पवित्र होती हैं। बैल भूख-प्याससे पीड़ित होकर भी नाना प्रकारके बोझ ढोते रहते हैं

ভীষ্মে ক’লে—হে দেৱাধিপ! এই গাভীবোৰৰ পৰাই গাখীৰ, দই আৰু ঘিউ উৎপন্ন হয়; সিহঁত নিশ্চয়েই পৰম পবিত্ৰ। আৰু বলদবোৰ ভোক-পিয়াহত কাতৰ হৈও নানা ধৰণৰ বোজা বহন কৰি থাকে।

Verse 21

मुनींश्व धारयन्तीह प्रजाश्वैवापि कर्मणा । वासवाकूटवाहिन्य: कर्मणा सुकृतेन च,“इस प्रकार गौएँ अपने कर्मसे ऋषियों तथा प्रजाओंका पालन करती रहती हैं। वासव! इनके व्यवहारमें माया नहीं होती। ये सदा सत्कर्ममें ही लगी रहती हैं

ভীষ্মে ক’লে—এই গাভীবোৰে নিজৰ কৰ্মৰ দ্বাৰাই মুনিসকল আৰু প্ৰজাসকলক ধাৰণ-পালন কৰে। হে বাসৱ! সিহঁতৰ আচৰণত কোনো ছলনা নাই; সুকৃত আৰু ধৰ্মকৰ্মে সিহঁত সদা শুভ কাৰ্যত নিয়োজিত থাকে।

Verse 22

उपरिष्टात्‌ ततो5स्माकं वसन्त्येता: सदैव हि । एवं ते कारणं शक्र निवासकृतमद्य वै,“इसीसे ये गौएँ हम सब लोगोंके ऊपर स्थानमें निवास करती हैं। शक्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह बात बतायी कि गौएँ देवताओंके भी ऊपर स्थानमें क्यों निवास करती हैं। शतक्रतु इन्द्र! इसके सिवा ये गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी हैं और प्रसन्न होनेपर दूसरोंको वर देनेकी भी शक्ति रखती हैं

ভীষ্মে ক’লে—সেই কাৰণেই এই গাভীবোৰে আমাৰ ওপৰৰ উচ্চ স্থানত সদায় বাস কৰে। হে শক্র! তোমাৰ প্ৰশ্ন অনুসাৰে মই ব্যাখ্যা কৰিলোঁ—গাভীবোৰ দেৱতাসকলৰো ওপৰত কিয় নিবাস কৰে। আৰু হে শতক্ৰতু ইন্দ্ৰ! সিহঁতে নিজেও বৰ লাভ কৰিছে; প্ৰসন্ন হ’লে আনকো বৰ দান কৰাৰ শক্তিও সিহঁতৰ আছে।

Verse 23

गवां देवोपरिष्टाद्धि समाख्यातं शतक्रतो । एता हि वरदत्ताश्न वरदाक्षापि वासव,“इसीसे ये गौएँ हम सब लोगोंके ऊपर स्थानमें निवास करती हैं। शक्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह बात बतायी कि गौएँ देवताओंके भी ऊपर स्थानमें क्यों निवास करती हैं। शतक्रतु इन्द्र! इसके सिवा ये गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी हैं और प्रसन्न होनेपर दूसरोंको वर देनेकी भी शक्ति रखती हैं

ভীষ্মে ক’লে—হে শতক্ৰতু! গাভীবোৰ দেৱতাসকলৰো ওপৰৰ স্থানত বাস কৰে বুলি ঘোষণা কৰা হৈছে। তোমাৰ প্ৰশ্ন অনুসাৰে মই কাৰণ জনালোঁ—সিহঁতে দেৱলোকৰো ওপৰত কিয় থাকে। আৰু হে বাসৱ! সিহঁত নিজেও বৰপ্ৰাপ্ত; প্ৰসন্ন হ’লে আনকো বৰ দিবলৈ সক্ষম।

Verse 24

सुरभ्य: पुण्यकर्मिण्य: पावना: शुभलक्षणा: । यदर्थ गां गताश्चैव सुरभ्य: सुरसत्तम

ভীষ্মে ক’লে—সুৰভী গাভীবোৰ পুণ্যকৰ্মিণী, স্বভাৱতঃ পাৱন আৰু শুভ লক্ষণযুক্ত। হে দেৱশ্ৰেষ্ঠ! কোন উদ্দেশ্যে এই সুৰভীবোৰ ইয়ালৈ আহিছে—গোৰ বিষয়ে সিহঁতৰ অভিপ্ৰায় কি?

Verse 25

पुरा देवयुगे तात देवेन्द्रेषु महात्मसु

ভীষ্মে ক’লে—তাত! প্ৰাচীন দেৱযুগত, যেতিয়া মহাত্মা দেৱগণ আৰু ইন্দ্ৰ-সদৃশ অধিপতিসকল উপস্থিত আছিল…

Verse 26

त्रींललोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते । अदित्यास्तप्यमानायास्तपो घोर सुदुश्चरम्‌

ভীষ্মে ক’লে—তিনিও লোকৰ অনুশাসক বিষ্ণু যেতিয়া গৰ্ভস্থ অৱস্থালৈ প্ৰৱেশ কৰিলে, তেতিয়া অদিতিয়ে সেই দিব্য উদ্দেশ্যৰ বাবে ঘোৰ আৰু অতি দুৰূহ তপস্যা গ্ৰহণ কৰিলে।

Verse 27

पुत्रार्थममरश्रेष्ठ पादेनैकेन नित्यदा । तां तु दृष्टवा महादेवीं तप्यमानां महत्तप:

ভীষ্মে ক’লে—হে অমৰশ্ৰেষ্ঠ! পুত্ৰলাভৰ বাবে তেওঁ নিত্য এক পায়ে থিয় হৈ থাকিছিল। সেই মহাদেৱীক মহাতপস্যাত লীন দেখি…

Verse 28

दक्षस्य दुहिता देवी सुरभी नाम नामतः । अतप्यत तपो घोरें हृष्टा धर्मपरायणा

ভীষ্মে ক’লে—দক্ষৰ কন্যা, সুৰভী নামৰ দেৱী, ধৰ্মত পৰায়ণ হৈ হর্ষসহ ঘোৰ তপস্যা কৰিবলৈ ধৰিলে।

Verse 29

“तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ] जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान्‌ तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षक साथ घोर तपस्या आस्मभ की ।। २५ --२८ || कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते । व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता,“कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे

ভীষ্মে ক’লে—তাত! পূৰ্বে সত্যযুগত, যেতিয়া মহামনা দেৱেশ্বৰগণে তিনিও লোক শাসন কৰিছিল, তেতিয়া, হে অমৰশ্ৰেষ্ঠ, দেৱী অদিতিয়ে পুত্ৰলাভৰ বাবে নিত্য এক পায়ে থিয় হৈ অতি ঘোৰ আৰু দুৰূহ তপস্যা কৰিছিল। তেওঁৰ তপস্যাত সন্তুষ্ট হৈ সাক্ষাৎ ভগৱান বিষ্ণুৱেই তেওঁৰ গৰ্ভত প্ৰৱেশ কৰিবলৈ উদ্যত আছিল। সেই দিনবোৰতেই মহাদেৱী অদিতিক মহাতপস্যাত লীন দেখি, দক্ষৰ ধৰ্মপরায়ণা কন্যা দেৱী সুৰভীয়ে হর্ষসহ ঘোৰ তপস্যা আৰম্ভ কৰিলে। দেৱ-গন্ধৰ্বসেৱিত মনোৰম কৈলাসশিখৰত তেওঁ পৰম যোগত স্থিত হৈ এক পায়ে থিয় হৈ ৰ’ল; এগাৰ হাজাৰ বছৰ তাতে অচল হৈ থাকিল। তেওঁৰ তপস্যাত দেৱতা, ঋষি আৰু মহাবলী নাগসকলো সন্তপ্ত হ’ল; তেওঁৰ একাগ্ৰ তপে লোকসমূহ কঁপাই তুলিছিল।

Verse 30

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । संतप्तास्तपसा तस्या देवा: सर्षिमहोरगा:,“कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे

কৈলাসৰ মনোৰম শিখৰত, য’ত দেৱতা আৰু গন্ধৰ্বসকল সদায়ে বিরাজ কৰে, তাতেই তাই উত্তম যোগৰ আশ্ৰয় লৈ এগাৰ হাজাৰ বছৰ এক পায়ে থিয় হৈ তপস্যা কৰিলে। তাইৰ তপস্যাত দেৱতা, ঋষি আৰু মহানাগসকলেও দগ্ধবৎ ব্যাকুল হৈ উঠিল।

Verse 31

तत्र गत्वा मया सार्ध पर्युपासन्त तां शुभाम्‌ । अथाहमनब्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम्‌,“वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए। तब मैंने वहाँ उससे कहा--

তেওঁলোক সকলোৱে মোৰ সৈতে তাত গৈ সেই শুভলক্ষণীয়া তপস্বিনী দেৱী সুৰভীৰ ওচৰত থিয় হৈ সেৱা-উপাসনা কৰিবলৈ ধৰিলে। তাৰ পাছত মই সেই ঠাইতে তপস্যাৰে সমন্বিত সেই দেৱীক ক’লোঁ—

Verse 32

किमर्थ तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते । प्रीतस्ते5हं महाभागे तपसानेन शो भने,'सती-साथ्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो।” पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया

হে দেৱী, অনিন্দিতা! তুমি কিয় এনে ঘোৰ তপস্যাৰে নিজকে ক্লিষ্ট কৰিছা? হে শোভনে, মহাভাগ্যে! তোমাৰ এই তপস্যাত মই অতিশয় প্ৰসন্ন। হে দেৱী, ইচ্ছামতে বৰ প্ৰাৰ্থনা কৰা।

Verse 33

वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर,'सती-साथ्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो।” पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया

পুৰন্দৰে ক’লে—“হে দেৱী, বৰ বাছনি কৰা; মই দান কৰিবলৈ প্ৰস্তুত।”

Verse 34

युरभ्युवाच वरेण भगवन्‌ महां कृतं लोकपितामह । एष एव वरो मेडद्य यत्‌ प्रीतोडसि ममानघ,सुरभीने कहा--भगवन्‌! निष्पाप लोकपितामह! मुझे वर लेनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे लिये तो सबसे बड़ा वर यही है कि आज आप मुझपर प्रसन्न हो गये हैं

সুৰভীয়ে ক’লে—“ভগৱন, নিষ্পাপ লোকপিতামহ! মোৰ কোনো বৰৰ প্ৰয়োজন নাই। হে অনঘ, আজি আপুনি মোৰ ওপৰত প্ৰসন্ন হৈছে—এইটোৱেই মোৰ বাবে সৰ্বশ্ৰেষ্ঠ বৰ।”

Verse 35

ब्रह्मोवाच तामेवं ब्रुवतीं देवीं सुरभिं त्रिदशेश्वर । प्रत्यब्रुवं यद्‌ देवेन्द्र तच्निबोध शचीपते,ब्रह्माजीने कहा--देवेश्वर! देवेन्द्र! शचीपते! जब सुरभी ऐसी बात कहने लगी तब मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह सुनो

ব্ৰহ্মাই ক’লে—ত্রিদশসকলৰ অধীশ্বৰ! দেৱেন্দ্ৰ! শচীপতে! দেৱী সুৰভী এইদৰে ক’বলৈ ধৰোঁতে মই তেওঁক যি উত্তৰ দিলোঁ, সেয়া শুনা।

Verse 36

चल हक पका हा मट दहा ? कक पक जे (4. 3-3... अलोभकाम्यया देवि तपसा च शुभानने । प्रसन्नो5हं वरं तस्मादमरत्वं ददामि ते,(मैंने कहा--) देवि! शुभानने! तुमने लोभ और कामनाको त्याग दिया है। तुम्हारी इस निष्काम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम्हें अमरत्वका वरदान देता हूँ

মই ক’লোঁ—দেৱী! শুভাননে! তুমি লোভ আৰু কামনা ত্যাগ কৰিছা। তোমাৰ নিষ্কাম তপস্যাত মই প্ৰসন্ন; সেয়ে তোমাক অমৰত্বৰ বৰ দিছোঁ।

Verse 37

त्रयाणामपि लोकानामुपरिष्टान्निवत्स्यसि । मत्प्रसादाच्च विख्यातो गोलोक: सम्भविष्यति,तुम मेरी कृपासे तीनों लोकोंके ऊपर निवास करोगी और तुम्हारा वह धाम “गोलोक' नामसे विख्यात होगा

মোৰ প্ৰসাদত তুমি তিনিও লোকৰ ওপৰত বাস কৰিবা, আৰু তোমাৰ সেই ধাম ‘গোলোক’ নামে বিখ্যাত হ’ব।

Verse 38

मानुषेषु च कुर्वाणा: प्रजा: कर्म शुभास्तव । निवत्स्यन्ति महाभागे सर्वा दुहितरश्न ते,महाभागे! तुम्हारी सभी शुभ संतानें--समस्त पुत्र और कन्याएँ मानवलोकमें उपयुक्त कर्म करती हुई निवास करेंगी

মহাভাগ্যে! তোমাৰ সকলো সন্তান—পুত্ৰ আৰু কন্যা—মানৱলোকত যোগ্য আৰু শুভ কৰ্ম কৰি বাস কৰিব।

Verse 39

मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषा: । यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत्‌ ते सम्पत्स्यते शुभे,देवि! शुभे! तुम अपने मनसे जिन दिव्य अथवा मानवी भोगोंका चिन्तन करोगी तथा जो स्वर्गीय सुख होगा, वे सभी तुम्हें स्वतः प्राप्त होते रहेंगे

দেৱী! শুভে! তুমি মনত যি দিব্য বা মানৱ ভোগ চিন্তা কৰিবা, আৰু স্বৰ্গত যি সুখ আছে—সেই সকলো তোমাৰ ওচৰলৈ আপুনি আহি পৰিব।

Verse 40

तस्या लोका: सहस्राक्ष सर्वकामसमन्विता: । न तत्र क्रमते मृत्युर्न जरा न च पावक:,सहस्राक्ष! सुरभीके निवासभूत गोलोकमें सबकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं। वहाँ मृत्यु और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता है। अग्निका भी जोर नहीं चलता

ভীষ্মে ক’লে—হে সহস্ৰাক্ষ (ইন্দ্ৰ)! তেওঁৰ লোকসমূহ সৰ্বকামসমন্বিত। তাত মৃত্যু প্ৰৱেশ নকৰে, জৰা নাই; অগ্নিৰো তাত কোনো প্ৰভাৱ নচলে।

Verse 41

नदैवं नाशुभं किंचिद्‌ विद्यते तत्र वासव | तत्र दिव्यान्यरण्यानि दिव्यानि भवनानि च

ভীষ্মে ক’লে—হে বাসৱ (ইন্দ্ৰ)! সেই লোকত দেৱবশত কোনো অনিষ্ট নাই, একো অশুভো নাই। তাত দিব্য অৰণ্য আছে, দিব্য ভবনো আছে।

Verse 42

ब्रह्म॒चर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च,शक्‍्य: समासादयितुं गोलोकः: पुष्करेक्षण । कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान्‌ तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है

ভীষ্মে ক’লে—হে পুষ্কৰেক্ষণ (কমলনয়ন) ইন্দ্ৰ! ব্ৰহ্মচৰ্য, তপস্যা, যত্ন আৰু ইন্দ্ৰিয়দমৰ দ্বাৰাই গ’লোক লাভ কৰিব পাৰি।

Verse 43

दानैश्न विविधै: पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात्‌ । तपसा महता चैव सुकृतेन च कर्मणा

ভীষ্মে ক’লে—বিভিন্ন পুণ্যদান, তীৰ্থানুসেৱন, মহান তপ আৰু সুকৃত কৰ্মৰ দ্বাৰা (ধৰ্মপথত উন্নতি হয়)।

Verse 44

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं मया शक्रानुपृच्छते,असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये

ভীষ্মে ক’লে—হে শক্ৰ, অসুৰসূদন! তোমাৰ প্ৰশ্ন অনুসাৰে মই এই সকলো কথা সম্পূৰ্ণকৈ কৈ দিলোঁ। সেয়ে তুমি কেতিয়াও গাইসমূহক তিৰস্কাৰ নকৰিবা।

Verse 45

न ते परिभव: कार्यो गवामसुरसूदन,असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये

ভীষ্মে ক’লে—হে অসুৰসূদন, হে শক্ৰ (ইন্দ্ৰ)! গাইসমূহৰ প্ৰতি কেতিয়াও অৱজ্ঞা নকৰিবা। তোমাৰ প্ৰশ্ন অনুসৰি মই সকলো কথা সম্পূৰ্ণকৈ ক’লোঁ; সেয়ে এতিয়াৰ পৰা গাইসমূহক নিন্দা বা তিৰস্কাৰ কেতিয়াও নকৰিবা।

Verse 46

भीष्म उवाच एतच्छूत्वा सहस्राक्ष: पूजयामास नित्यदा । गाश्षक्रे बहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रतिदिन गौओंकी पूजा करने लगे। उन्होंने उनके प्रति बहुत सम्मान प्रकट किया

ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! ব্ৰহ্মাৰ এই বাক্য শুনি সহস্ৰাক্ষ ইন্দ্ৰে প্ৰতিদিন গাইসমূহৰ পূজা কৰিবলৈ ধৰিলে আৰু সদায় তেওঁলোকৰ প্ৰতি মহৎ সন্মান প্ৰকাশ কৰিলে।

Verse 47

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं पावनं च महाद्युते । पवित्र परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम्‌,महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है

হে মহাদ্যুতে! গাইসমূহৰ এই পৰম পাৱন, পৰম পবিত্ৰ আৰু অতি উত্তম মাহাত্ম্য—সকলো—মই তোমাক ক’লোঁ।

Verse 48

कीर्तितं पुरुषव्याप्र सर्वपापविमोचनम्‌ | य इदं कथयेन्नित्यं ब्राह्मणेभ्य:ः समाहित:,पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ (हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा

হে পুৰুষব্যাঘ্ৰ! ইয়াৰ কীৰ্তন সৰ্বপাপবিমোচন বুলি ঘোষিত। যি একাগ্ৰচিত্তে নিত্য ব্ৰাহ্মণসকলক এই প্ৰসঙ্গ বৰ্ণনা কৰে—বিশেষকৈ যজ্ঞত হব্য অৰ্পণৰ সময়ত আৰু শ্ৰাদ্ধত কব্য নিবেদনৰ সময়ত—তাৰ দিয়া হব্য-কব্য নিষ্ফল নহয়; সেয়া সকলো ধৰ্মসন্মত কামনা পূৰ্ণ কৰে আৰু অক্ষয় পুণ্য হৈ পিতৃলোকলৈ পৌঁছে।

Verse 49

हव्यकव्येषु यज्ञेषु पितृकार्येषु चैव ह । सार्वकामिकमक्षय्यं पितृंस्तस्योपतिष्ठते,पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ (हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा

হে পুৰুষসিংহ! হব্য-কব্যযুক্ত যজ্ঞসমূহত আৰু পিতৃকাৰ্যৰ সকলো বিধিত এই (কীৰ্তন) সৰ্বকামসিদ্ধিদায়ক আৰু অক্ষয় ফলপ্ৰদ; এনে ভক্তিৰে কৰা অৰ্পণ অক্ষয় লাভ হৈ পিতৃলোকলৈ পৌঁছে।

Verse 50

गोषु भक्तश्न लभते यद्‌ यदिच्छति मानव: । स्त्रियोडपि भक्ता या गोषु ताश्व काममवाप्रुयु:,गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं

গো-ভক্ত মানুহে যি যি কামনা কৰে, সেয়া সকলো লাভ কৰে। নাৰীৰ মাজতো যিসকলে গাইৰ প্ৰতি ভক্তি ৰাখে, তেওঁলোকেও মনোবাঞ্ছিত কামনা পূৰ্ণ কৰে।

Verse 51

पुत्रार्थी लभते पुत्र॑ कन्यार्थी तामवाप्लनुयात्‌ धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्तुयात्‌,पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्‍्या। धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको धर्म प्राप्त होता है

পুত্ৰ কামনা কৰা জনে পুত্ৰ লাভ কৰে, কন্যা কামনা কৰা জনে কন্যা লাভ কৰে। ধন কামনা কৰা জনে ধন পায়, আৰু ধৰ্ম কামনা কৰা জনে ধৰ্ম লাভ কৰে।

Verse 52

विद्यार्थी चाप्तुयाद्‌ विद्यां सुखार्थी प्राप्तुयात्‌ सुखम्‌ । न किंचिद्‌ दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत,विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है

বিদ্যাৰ্থী বিদ্যা লাভ কৰে, সুখ কামনা কৰা জনে সুখ লাভ কৰে। হে ভাৰত! গো-ভক্তৰ বাবে ইয়াত একোৱেই দুৰ্লভ নহয়।

Verse 82

इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और गौओंका संवादनामक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত ‘লক্ষ্মী আৰু গাইসমূহৰ সংবাদ’ নামৰ বিৰাশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Verse 83

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोलोकवर्णने त्रय्शीतितमो<5ध्याय:

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত গোলোক-বৰ্ণনা বিষয়ক তিৰাশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Verse 186

जनयन्ति च धान्यानि बीजानि विविधानि च । “ये अपने दूध-घीसे प्रजाका भी पालन-पोषण करती हैं। इनके पुत्र (बैल) खेतीके काम आते तथा नाना प्रकारके धान्य एवं बीज उत्पन्न करते हैं

সিহঁতে নানা প্ৰকাৰৰ ধান্য আৰু বিভিন্ন বীজো উৎপন্ন কৰে।

Verse 243

तच्च मे शृणु कारत्स्न्येन वदतो बलसूदन । 'सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ-लक्षणा होती हैं। सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो

হে বলসূদন! মই যি কৈ আছোঁ, সেয়া সম্পূৰ্ণকৈ শুনা। সুৰভি গাভীসকল পুণ্যকৰ্মৰ সাধিকা আৰু শুভলক্ষণযুক্ত; আৰু যি উদ্দেশ্যে তেওঁলোকে পৃথিৱীত অৱতীৰ্ণ হৈছে, সেয়াও মই বিস্তাৰে কৈছোঁ—শুনা।

Verse 416

विमानानि सुयुक्तानि कामगानि च वासव । वासव! वहाँ न कोई दुर्भाग्य है और न अशुभ। वहाँ दिव्य वन, दिव्य भवन तथा परम सुन्दर एवं इच्छानुसार विचरनेवाले विमान मौजूद हैं

হে বাসৱ! তাত ন দুৰ্ভাগ্য আছে, ন অশুভ। তাত দিব্য বন আৰু দিব্য ভৱন আছে; আৰু অতি সুন্দৰ, ইচ্ছানুসাৰে গতি কৰা বিমানো বিদ্যমান।

Verse 433

शक्‍्य: समासादयितुं गोलोकः: पुष्करेक्षण । कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान्‌ तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है

হে পদ্মনয়ন! গোৱলোক লাভ কৰা নিশ্চয়েই সম্ভৱ; কিন্তু সেয়া ব্ৰহ্মচৰ্য, তপস্যা, নিৰন্তৰ যৎন, ইন্দ্ৰিয়সংযম, নানা প্ৰকাৰ দান, পুণ্যসঞ্চয়, তীৰ্থসেৱন, মহাতপ আৰু অন্যান্য শুভ কৰ্মৰ অনুষ্ঠানৰ দ্বাৰাই হয়।

Frequently Asked Questions

The interpretive problem is reconciling Tāraka’s reputed near-invulnerability with his eventual defeat; the chapter resolves this by locating the outcome in divinely sanctioned leadership (Skanda as senāpati) and in the emergence of a countervailing power aligned with cosmic order.

Suvarṇa is framed not merely as wealth but as condensed tejas associated with Agni and Kārttikeya; gifting it, when performed with discipline and right intention, is presented as a meritorious act that supports purification and social-religious continuity.

Yes: the closing reference to Rāma receiving Vasiṣṭha’s account and attaining release from faults through giving suvarṇa functions as a phalaśruti-style validation, presenting suvarṇa-dāna as yielding purification and a high, difficult-to-attain celestial station.