
भूमिदान-प्रसङ्गः । काश्यपी-पृथिवी तथा उतथ्य-वरुण-संवादः (Land-gift episode; Pṛthivī Kāśyapī; Utathya–Varuṇa dispute)
Upa-parva: Dāna-Dharma / Exempla of Gift and Moral Authority (episode including Kaśyapa, Pṛthivī-Kāśyapī, and Utathya–Varuṇa)
Vāyu narrates to the king an instructive sequence on moral authority over resources and relationships. First, King Aṅga intends to offer the earth as dakṣiṇā to Brahmins. The Earth (Pṛthivī), personified as Brahmā’s daughter, recoils at being ‘given away’ and seeks to depart from earthhood; Kaśyapa intercepts and enters/stabilizes her, after which she becomes known as Pṛthivī Kāśyapī, symbolizing dharmic grounding through sage-authority. The narration then shifts to Utathya of the Aṅgiras line and Bhadrā, daughter of Soma, given in marriage to Utathya. Varuṇa desires Bhadrā and takes her to his wondrous aquatic city. Informed by Nārada, Utathya demands her return through a message; Varuṇa refuses. Utathya, angered, employs ascetic potency to ‘drink up’ the waters, pressuring the water-lord; he further commands the earth to reveal dry ground, producing an arid tract and causing the sea to recede, and he curses the region’s auspiciousness while directing the river Sarasvatī to become unseen and move toward the desert. Under these conditions Varuṇa returns Bhadrā; Utathya accepts her, releases Varuṇa from distress, and asserts that his tapas secured restitution. The chapter’s didactic force is that dharma regulates gifts, possession, and seizure: even cosmic powers are bounded by ethical accountability and must restore what is wrongfully taken.
Chapter Arc: भीष्म के उपदेश-प्रवाह में ‘धर्म का गुप्त रहस्य’ उद्घाटित होता है—स्कन्ददेवक-रहस्य के अंतर्गत एक ऐसा विधान, जो पाप-शोधन और परलोक-आधिपत्य का वचन देता है। → विष्णु-प्रवचन के रूप में विधि का सूक्ष्म अनुशासन सामने आता है: पौर्णमासी की रात्रि, चन्द्रोदय का क्षण, ताँबे का पात्र, मधु-मिश्रित पक्वान्न—और ठीक उसी समय सोम के लिए बलि-समर्पण। साधक के मन में प्रश्न उठता है: क्या इतना ‘छोटा’ कर्म इतना ‘बड़ा’ फल दे सकता है? → विधान का महात्म्य निर्णायक रूप से घोषित होता है—यह बलि मरुतों और वसुओं द्वारा ग्रहण की जाती है; सोम का वर्धन होता है और ‘महोदधि’ तक की वृद्धि का रूपक देकर कर्म-फल की व्यापकता स्थापित की जाती है। → श्रवण-पाठ का भी फल बताया जाता है: श्रद्धा से सुनने/पढ़ने वाले को विघ्न और भय नहीं सताते, पाप का स्पर्श नहीं होता; वह पापों को धोकर परत्र आधिपत्य पाता है और पुनर्जन्म में भी शौर्य-सम्पन्न होता है।
Verse 1
अपन काल छा | अत-७#-र- चतुस्त्रिंशर्दाधिकशततमो< ध्याय: स्कन्ददेवका धर्मसम्बन्धी रहस्य तथा भगवान् विष्णु और भीष्मजीके द्वारा माहात्म्यका वर्णन स्कन्द उवाच ममाप्यनुमतो धर्मस्तं शृणुध्वं समाहिता: । नीलषण्डस्य शुंगाभ्यां गृहीत्वा मृत्तिकां तु यः:
স্কন্দে ক’লে—মোৰ দ্বাৰাও অনুমোদিত এই ধৰ্ম শুনা; তোমালোক সকলোৱে একাগ্ৰচিত্তে শ্ৰৱণ কৰা। যি নীলষণ্ডৰ দুটা ‘শৃংগ’ (উঠা প্ৰক্ষেপ)ৰে মাটি তোলে…
Verse 2
शोधयेदशुभ॑ सर्वमाधिपत्यं परत्र च
সি সকলো অশুভ শোধন কৰক—ইহলোকত নিজৰ আধিপত্য-আচৰণতো আৰু পৰলোকতো।
Verse 3
इदं चाप्यपरं गुह्ं सरहस्यं निबोधत,अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णममासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म-फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुदगण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है
স্কন্দে ক’লে—এতিয়া এই আন এটা গূঢ় উপদেশ, তাৰ অন্তৰ্নিহিত ৰহস্যসহ, বুজি লোৱা। পুৰ্ণিমাত চন্দ্ৰোদয়ৰ সময়ত যদি কোনো পুৰুষ তাম্ৰপাত্ৰত মধু-মিশ্ৰিত পক্বান্ন লৈ চন্দ্ৰৰ উদ্দেশে বলি অৰ্পণ কৰে, তেন্তে সেই ধৰ্মক্ৰিয়াৰ নিত্য ফল—শ্ৰদ্ধাৰে শুনা—তেওঁ লাভ কৰে। সেই পুৰুষে দিয়া সেই বলি সাধ্য, ৰুদ্ৰ, আদিত্য, বিশ্বেদেৱ, অশ্বিনীদ্বয়, মৰুদ্গণ আৰু বসুসকলেও গ্ৰহণ কৰে; আৰু তাতে চন্দ্ৰ আৰু সমুদ্ৰৰ বৃদ্ধি হয় বুলি কোৱা হয়। এইদৰে মই ৰহস্যসহ সুখদায়ক ধৰ্ম বৰ্ণনা কৰিলোঁ।
Verse 4
प्रगृह्मौदुम्बरं पात्र पक््वान्नं मधुना सह | सोमस्योत्तिष्ठमानस्य पौर्णमास्यां बलिं हरेत्,अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णममासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म-फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुदगण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है
ঔদুম্বৰ কাঠৰ পাত্ৰ লৈ, পুৰ্ণিমাত চন্দ্ৰ উদয় হওঁতে, মধুসহ পক্বান্ন সোম (চন্দ্ৰ)ৰ উদ্দেশে বলি হিচাপে অৰ্পণ কৰা উচিত।
Verse 5
तस्य धर्मफल नित्यं श्रद्दधाना निबोधत । साध्या रुद्रास्तथादित्या विश्वेदेवास्तथाश्विनौ,अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णममासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म-फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुदगण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है
সেই ধৰ্মক্ৰিয়াৰ নিত্য ফল—শ্ৰদ্ধাৰে—বুজি লোৱা। সাধ্য, ৰুদ্ৰ, আদিত্য, বিশ্বেদেৱ আৰু অশ্বিনীদ্বয়েও তাক গ্ৰহণ কৰে।
Verse 6
मरुतो वसवश्चैव प्रतिगृह्नन्ति तं बलिम् । सोमश्न वर्धते तेन समुद्रश्चन महोदधि:,अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णममासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म-फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुदगण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है
স্কন্দে ক’লে—মৰুত আৰু বসুসকলেও সেই বলি গ্ৰহণ কৰে। তাৰ দ্বাৰা সোম (চন্দ্ৰ) বৃদ্ধি পায় আৰু মহাসাগৰো বাঢ়ে। এইদৰে মই ৰহস্যসহ কল্যাণকাৰী ধৰ্ম বৰ্ণনা কৰিলোঁ।
Verse 7
एष धर्मो मयोद्दिष्ट: सरहस्य: सुखावह:,अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णममासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म-फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुदगण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है
এই ধৰ্ম মই উপদেশ কৰিছোঁ—ৰহস্যসহ আৰু সুখদায়ক।
Verse 8
विष्णुरुवाच धर्मगुह्मानि सर्वाणि देवतानां महात्मनाम् | ऋषीणां चैव गुह्मानि यः पठेदाह्विकं सदा,भगवान् विष्णु बोले--जो देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके बताये हुए धर्मसम्बन्धी इन सभी गूढ़ रहस्योंका प्रतिदिन पाठ करेगा अथवा दोषदृष्टिसे रहित हो सदा एकाग्रचित्त रहकर श्रद्धापूर्वक श्रवण करेगा, उसपर किसी विघ्नका प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा उसे कोई भय भी नहीं प्राप्त होगा
ভগৱান বিষ্ণুৱে ক’লে—দেৱতা আৰু মহাত্মা ঋষিসকলে কোৱা ধৰ্ম-সম্পৰ্কীয় এই সকলো গূঢ় ৰহস্য যিয়ে নিতৌ পাঠ কৰে,
Verse 9
शृणुयाद् वानसूयुर्य: श्रद्धधान: समाहित: । नास्य विध्न: प्रभवति भयं चास्य न विद्यते,भगवान् विष्णु बोले--जो देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके बताये हुए धर्मसम्बन्धी इन सभी गूढ़ रहस्योंका प्रतिदिन पाठ करेगा अथवा दोषदृष्टिसे रहित हो सदा एकाग्रचित्त रहकर श्रद्धापूर्वक श्रवण करेगा, उसपर किसी विघ्नका प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा उसे कोई भय भी नहीं प्राप्त होगा
আৰু যিয়ে দোষদৃষ্টি নোহোৱাকৈ, শ্ৰদ্ধাৰে, একাগ্ৰচিত্তে শুনে—তাৰ ওপৰত কোনো বিঘ্নে প্ৰভাৱ পেলাব নোৱাৰে, আৰু তাৰ ভয়ো নাথাকে।
Verse 10
् / (७ १) प, 4 ७4 | जे (0५ ७७६३३३७७७७३७७०४ ७७ जे २३७०० (९७). _/-* 6-3 9 5 च्ज्ल ज ० 2 55 ५ -सक्क ताक ५७] ; ५७. ।॒ बन ये च धर्मा: शुभा: पुण्या: सरहस्या उदाहता: । तेषां धर्मफलं तस्य यः पठेत जितेन्द्रिय:,यहाँ जिन-जिन पवित्र एवं कल्याणकारी धर्मोंका रहस्योंसहित वर्णन किया गया है, उन सबका जो इन्द्रियसंयमपूर्वक पाठ करेगा, उसे उन धर्मोका पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा
ইয়াত ৰহস্যসহ যিসকল শুভ আৰু পুণ্য ধৰ্ম বৰ্ণিত হৈছে—যিয়ে ইন্দ্ৰিয়জয়সহ সিহঁতৰ পাঠ কৰে, সিয়ে সেই ধৰ্মসমূহৰ সম্পূৰ্ণ ফল লাভ কৰে।
Verse 11
नास्य पापं प्रभवति न च पापेन लिप्यते | पठेद् वा श्रावयेद् वापि श्रुत्वा वा लभते फलम्
তাৰ বাবে পাপ উদ্ভৱ নহয়, আৰু সি পাপত লিপ্তও নহয়। যিয়ে ইয়াক পাঠ কৰে, আনক শ্ৰৱণ কৰায়, বা কেৱল শুনে—সিও ইয়াৰ ফল লাভ কৰে।
Verse 12
भुज्जते पितरो देवा हव्यं कव्यमथाक्षयम् । उसके ऊपर कभी पापका प्रभाव नहीं पड़ेगा, वह कभी पापसे लिप्त नहीं होगा। जो इस प्रसंगको पढ़ेगा, दूसरोंको सुनायेगा अथवा स्वयं सुनेगा, उसे भी उन धर्मोंके आचरणका फल मिलेगा। उसका दिया हुआ हव्य-कव्य अक्षय होगा तथा उसे देवता और पितर बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण करेंगे ।। ११ ई ।। श्रावयंश्वापि विप्रेन्द्रान् पर्वसु प्रयतो नर:,जो मनुष्य पर्वके दिन शुद्धचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धर्मके इन रहस्योंका श्रवण करायेगा, वह सदा देवता, ऋषि और पितरोंके आदरका पात्र एवं श्रीसम्पन्न होगा। उसकी सदा धर्मोमें प्रवृत्ति बनी रहेगी
দেৱতা আৰু পিতৃগণে হব্য আৰু কব্য—এই অৰ্ঘ্য অক্ষয়ভাৱে গ্ৰহণ কৰে। যি ব্যক্তি পৰ্বদিনত নিয়মপালন কৰি শুদ্ধচিত্ত হৈ শ্ৰেষ্ঠ ব্ৰাহ্মণসকলক ধৰ্মৰ এই সূক্ষ্ম ৰহস্য শ্ৰৱণ কৰায়, সি দেৱতা, ঋষি আৰু পিতৃগণৰ নিত্য আদৰৰ পাত্ৰ হয়; তাৰ শ্ৰী-সমৃদ্ধি বৃদ্ধি পায় আৰু ধৰ্মত তাৰ প্ৰবৃত্তি স্থিৰ থাকে।
Verse 13
ऋषीणां देवतानां च पितृणां चैव नित्यदा । भवत्यभिमत: श्रीमान् धर्मेषु प्रयतः सदा,जो मनुष्य पर्वके दिन शुद्धचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धर्मके इन रहस्योंका श्रवण करायेगा, वह सदा देवता, ऋषि और पितरोंके आदरका पात्र एवं श्रीसम्पन्न होगा। उसकी सदा धर्मोमें प्रवृत्ति बनी रहेगी
যি সদায় ধৰ্মত প্ৰয়াসশীল থাকে, সি ঋষি, দেৱতা আৰু পিতৃগণৰ ওচৰত নিত্য প্ৰিয় আৰু মান্য হয়। সি শ্ৰী-সমৃদ্ধ হয় আৰু ধৰ্মাচৰণত অচল থাকে।
Verse 14
कृत्वापि पापकं कर्म महापातकवर्जितम् | रहस्यधर्म श्रुत्वेमं सर्वपापै: प्रमुच्यते,मनुष्य महापातकको छोड़कर अन्य पापोंका आचरण करके भी यदि इस रहस्य- धर्मको सुन लेगा तो उन सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा
মহাপাতক বাদ দি আন পাপকৰ্ম কৰিলেও, এই ৰহস্য-ধৰ্ম শ্ৰৱণ কৰিলে মাত্ৰ সি সেই সকলো পাপৰ পৰা মুক্ত হয়।
Verse 15
भीष्म उवाच एतद् धर्मरहस्यं वै देवतानां नराधिप । व्यासोद्दिष्टं मया प्रोक्ते सर्वदेवनमस्कृतम्
ভীষ্ম ক’লে—হে নৰাধিপ! এইয়েই ধৰ্মৰ ৰহস্যসাৰ, যি দেৱতাসকলৰ মাজতো পূজ্য। ইয়াৰ ইঙ্গিত ব্যাসে দিছিল; সেই কথাই মই তোমাক ক’লোঁ—যি সৰ্বদেৱতাৰো নমস্য।
Verse 16
अभिषेक त्र्यहं कुर्यात् तस्य धर्म निबोधत । स्कन्दने कहा--देवताओ! अब एकाग्रचित्त होकर मेरी मान्यताके अनुसार भी धर्मका गोपनीय रहस्य सुनो। जो मनुष्य नीले रंगके साँड़की सींगोंमें लगी हुई मिट्टी लेकर इससे तीन दिनोंतक स्नान करता है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यका वर्णन सुनो,भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! देवताओंके बताये हुए इस धर्मरहस्यको व्यासजीने मुझसे कहा था। उसीको मैंने तुम्हें बताया है। यह सब देवताओंद्वारा समादृत है ।। पृथिवी रत्नसम्पूर्णा ज्ञानं चेदमनुत्तमम् । इदमेव ततः श्राव्यमिति मन्येत धर्मवित्
স্কন্দে ক’লে—“তিনিদিন অভিষেক (স্নান-ব্ৰত) কৰা উচিত; তাৰ ধৰ্ম বুজা। পৃথিৱী ৰত্নেৰে পৰিপূৰ্ণ হ’লেও, আৰু এই উপদেশ অনুত্তম জ্ঞান হ’লেও, ধৰ্মজ্ঞ এইদৰে মাণিব—‘এইটোৱেই শ্ৰৱণীয়।’”
Verse 17
एक ओर रत्नोंसे भरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी प्राप्त होती हो और दूसरी ओर यह सर्वोत्तम ज्ञान मिल रहा हो तो उस पृथ्वीको छोड़कर इस सर्वोत्तम ज्ञानको ही श्रवण एवं ग्रहण करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुष ऐसा ही माने ।। नाश्रद्धधानाय न नास्तिकाय न नष्टधर्माय न निर्घणाय । न हेतुदुष्टाय गुरुद्धिषे वा नानात्मभूताय निवेद्यमेतत्,न श्रद्धाहीनको, न नास्तिकको, न धर्म नष्ट करनेवालेको, न निर्दयीको, न युक्तिवादका सहारा लेकर दुष्टता करनेवालेको, न मुरुद्रोहीकों और न देहाभिमानी व्यक्तिको ही इस धर्मका उपदेश देना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—এফালে যদি ৰত্নেৰে ভৰা সমগ্ৰ পৃথিৱী লাভ হয়, আৰু সিফালে যদি এই পৰম জ্ঞান লাভ হয়, তেন্তে সেই পৃথিৱী ত্যাগ কৰি এই পৰম জ্ঞান শ্ৰৱণ আৰু গ্ৰহণ কৰা উচিত; ধৰ্মজ্ঞ এইদৰেই মাণিব। এই উপদেশ শ্ৰদ্ধাহীনক, নাস্তিকক, ধৰ্মনাশকক, নিৰ্দয়ক, কুতৰ্কেৰে দুষ্কৰ্ম ঢাকিবলৈ চেষ্টা কৰা লোকক, গুৰুদ্বেষীক, আৰু দেহাভিমানত লীন লোকক দিব নালাগে।
Verse 26
यावच्च जायते मर्त्यस्तावच्छूरो भविष्यति । वह अपने सारे पापोंको धो डालता है और परलोकमें आधिपत्य प्राप्त करता है। फिर जब वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, तब शूरवीर होता है
স্কন্দে ক’লে—যিমান দিন মানুহ মর্ত্য হিচাপে জন্ম লৈ থাকিব, সিমান দিন সি শূৰ হৈ থাকিব।
Verse 133
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত মহাদেৱে কোৱা ধৰ্ম-ৰহস্যবিষয়ক একশ তেত্ৰিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 134
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्कन्ददेवरहस्ये चतुस्त्रिंशयदाधिकशततमो<ध्याय:
ইতি শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বত দানধৰ্মপৰ্বৰ অন্তৰ্গত স্কন্দদেৱ-ৰহস্যবিষয়ক একশ ঊনচল্লিশতম অধ্যায়।
Whether land and persons can be treated as transferable property: Aṅga’s proposed earth-gift and Varuṇa’s seizure of Bhadrā both test the limits of ownership, asserting that dharma constrains transfer and demands consent and restitution.
Moral legitimacy outweighs sheer power: tapas and dharma operate as supra-political constraints, ensuring that resources (earth/water) and relationships (marriage) remain ordered through accountability and corrective return.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter functions primarily as an exemplum whose ‘reward’ is implicit—ethical clarity about dāna, non-appropriation, and the necessity of restitution within dharmic governance.