Śukra’s Ultimatum and Devayānī’s Demand (शुक्र-प्रतिज्ञा तथा देवयानी-वर-याचना)
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति | यदा नेच्छति न डेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा,“जब सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि होनेके कारण यह पुरुष किसीसे नहीं डरता और जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह न तो किसीकी इच्छा करता है और न किसीसे द्वेष ही रखता है, उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है”
yadā cāyaṃ na bibheti yadā cāsmān na bibhyati | yadā necchati na dveṣṭi brahma sampadyate tadā ||
বৈশম্পায়নে ক’লে—যেতিয়া এই পুৰুষে কাকো ভয় নকৰে আৰু আন জীৱসকলেও তাক ভয় নকৰে; যেতিয়া সি একো কামনা নকৰে, কাকো দ্বেষ নকৰে—তেতিয়া সি ব্ৰহ্মক প্ৰাপ্ত হয়।
वैशम्पायन उवाच