अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
(तस्मै तदान्तरिक्षात् तु पुष्पवृष्टि: पपात ह | देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणा: ।। गायन्त्यो मधुरं तत्र देवैः शक्रो5भ्युवाच ह । उस समय आकाशसे उस बालकके लिये फूलोंकी वर्षा हुई, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और अप्सराएँ मधुर स्वरमें गाती हुई नृत्य करने लगीं। उस अवसरपर वहाँ देवताओंसहित इन्द्रने आकर कहा। शक्र उवाच शकुन्तले तव सुतश्नक्रवर्ती भविष्यति ।। बल॑ तेजश्न रूपं च न सम॑ भुवि केनचित् | आहर्ता वाजिमेधस्य शतसंख्यस्य पौरव: ।। अनेकानि सहस्राणि राजसूयादिभिर्मखै: । स्वार्थ ब्राह्मणसात् कृत्वा दक्षिणाममितां ददात् ।। इन्द्र बोले--शकुन्तले! तुम्हारा यह पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा। पृथ्वीपर कोई भी इसके बल, तेज तथा रूपकी समानता नहीं कर सकता। यह पूरुवंशका रत्न सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करेगा। राजसूय आदि यज्ञोंद्वारा सहस्रों बार अपना सारा धन ब्राह्मणोंके अधीन करके उन्हें अपरिमित दक्षिणा देगा। वैशम्पायन उवाच देवतानां वच: श्रुत्वा कण्वाश्रमनिवासिन: । सभाजयन्त कण्वस्य सुतां सर्वे महर्षय: ।। शकुन्तला च ६ त्वा परं हर्षमवाप सा । द्विजानाहूय : सत्कृत्य च महायशा: ।।) जातकर्मादिसंस्कारं कण्व: पुण्यकृतां वर: । विधिवत् कारयामास वर्धमानस्य धीमतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--इन्द्रादि देवताओंका यह वचन सुनकर कण्वके आश्रममें रहनेवाले सभी महर्षि कण्वकन्या शकुन्तलाके सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। यह सब सुनकर शकुन्तलाको भी बड़ा हर्ष हुआ। पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी कण्वने मुनियोंसे ब्राह्मगोंको बुलाकर उनका पूर्ण सत्कार करके बालकका विधिपूर्वक जातकर्म आदि संस्कार कराया। वह बुद्धिमान् बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा
tasmai tadāntarikṣāt tu puṣpavṛṣṭiḥ papāta ha | devadundubhayo nedur nanṛtuścāpsarogaṇāḥ || gāyantyo madhuraṃ tatra devaiḥ śakro 'bhyuvāca ha ||
তেতিয়া সেই শিশুটিৰ বাবে আকাশৰ পৰা পুষ্পবৃষ্টি নামিল; দেবদুন্দুভি বাজি উঠিল, আৰু অপ্সৰাগণে মধুৰ গীত গাই গাই নৃত্য কৰিবলৈ ধৰিলে। সেই সময়তে দেবতাসকলৰ সৈতে শক্ৰ (ইন্দ্ৰ) তাত আহি ক’লে—“শকুন্তলে! তোমাৰ এই পুত্ৰ চক্রৱৰ্তী সম্ৰাট হ’ব। পৃথিৱীত বল, তেজ আৰু ৰূপত তাৰ সমান কোনো নাই। পৌৰৱ বংশৰ এই ৰত্নে শত অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্পাদন কৰিব; ৰাজসূয় আদি মহাযজ্ঞে সহস্ৰবাৰ নিজৰ ধন ব্ৰাহ্মণসকলৰ অধীন কৰি অপাৰ দক্ষিণা দান কৰিব।” এই বচন শুনি কণ্বাশ্ৰমবাসী মহর্ষিসকলে কণ্বকন্যা শকুন্তলাৰ সৌভাগ্যৰ প্ৰশংসা কৰিলে; শকুন্তলাৰো পৰম আনন্দ হ’ল। তাৰ পাছত পুণ্যশীল কণ্বে ব্ৰাহ্মণসকলক মাতি সন্মান জনাই, বৃদ্ধি পাই থকা বুদ্ধিমান শিশুটোৰ জাতকৰ্ম আদি সংস্কাৰ বিধিপূৰ্বক সম্পন্ন কৰালে।
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights how righteous destiny and social order (dharma) are affirmed through auspicious signs: divine celebration marks the birth and protection of a future upholder of dharma, suggesting that ethical kingship is not merely personal power but a divinely endorsed responsibility.
Celestial omens occur at the child’s appearance: flowers rain from the sky, divine drums sound, and apsarases sing and dance. Indra arrives with the gods and begins to speak, indicating the child’s extraordinary future and the gods’ recognition of the event.